सपनों का खौफ - भाग 3
Writer: Lucky Thakur
अर्पित की धड़कनें तेज़ हो गईं, जैसे हवेली के भीतर हर कदम पर उसका पीछा करने वाला एक अजीब सा साया उसके साथ हो। उसने कागज को कस कर पकड़ा और उस पर लिखे शब्दों को बार-बार पढ़ने लगा। "तुम अपने पूर्वजों की संतान हो, और तुम्हारी आत्मा की शक्ति जागृत हो चुकी है।" ये शब्द उसके दिमाग में गूंज रहे थे। क्या वह वाकई अपनी पहचान से अनजान था? क्या उसका जन्म किसी विशेष उद्देश्य के लिए हुआ था?
अर्पित ने संदूक से बाकी चीजों को बाहर निकाला, पर उस कागज के अलावा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं था। कमरे में घना अंधेरा था, और हवेली की खामोशी में उसकी कदमों की आवाज़ गूंज रही थी। अचानक उसके कानों में एक हल्की सी फुसफुसाहट सुनाई दी, जैसे कोई दूर से बात कर रहा हो। उसने अपनी टोर्च की रोशनी को चारों ओर घुमाया, लेकिन कुछ भी नहीं दिखाई दिया। फिर, वह फुसफुसाहट और तेज़ हो गई। वह हल्का सा डरते हुए आवाज़ की ओर बढ़ा।
"तुम क्या चाहते हो?" अर्पित ने धीरे से पूछा, जैसे किसी से बात कर रहा हो, लेकिन उसके शब्द हवेली में खो गए। फिर वह अचानक रोशनी के एक बिंदु पर रुका। उसकी नजरें उस बिंदु पर स्थिर हो गईं, जहां अंधेरे में एक चित्र उभरने लगा था। यह एक पुरानी चित्रकला थी, जिसमें एक महिला का चित्र था। महिला का चेहरा उसे वही परिचित सा लगा, जो उसने पहले अपनी दीवार पर देखा था। वह महिला वही थी। लेकिन इस चित्र में कुछ और था, जो अर्पित ने पहले कभी नहीं देखा था – उसके हाथ में एक अंगूठी थी। वह अंगूठी चमक रही थी और उसके चारों ओर एक हल्का सा आभा था।
अर्पित ने चित्र को ध्यान से देखा और समझने की कोशिश की। वह महिला और अंगूठी के बीच कुछ तो खास था। "क्या यह अंगूठी मुझे मिली थी?" उसने खुद से सवाल किया। उसके दिमाग में विचारों की बाढ़ आ गई। क्या वह महिला उसकी कोई पुरानी पहचान थी? क्या वह अंगूठी उसकी किस्मत से जुड़ी थी?
अर्पित ने फिर उस चित्र के पास जाकर दीवार पर उकेरे गए बाकी चित्रों को देखा। सभी चित्र उसी महिला के थे, लेकिन हर चित्र में वह कुछ अलग दिख रही थी। कहीं वह खुश थी, कहीं ग़म में डूबे हुए चेहरे के साथ, और कहीं उसका चेहरा गंभीर था। चित्रों को देखकर यह साफ़ था कि उस महिला का जीवन किसी रहस्य से भरा हुआ था।
तभी, जैसे ही अर्पित ने एक चित्र को छुआ, अचानक कमरे में बिजली की एक कड़क आवाज़ सुनाई दी और पूरा कमरा झपकते हुए रोशनी से भर गया। कमरे के हर कोने में एक हल्की सी आभा फैलने लगी, और अचानक दीवार से वही महिला बाहर निकल आई। उसका चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आँखों में एक विचित्र सी दया और क्रोध था।
"तुमने अब तक बहुत कुछ देख लिया है, अर्पित," महिला ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक हलका सा करुणा था। "लेकिन तुम अभी भी पूरी सच्चाई से अनजान हो।"
अर्पित ने कांपते हुए पूछा, "तुम कौन हो? और ये सब क्या है?"
महिला ने गहरी सांस ली, और फिर कहा, "मैं तुम्हारी दादी हूं, अर्पित।"
इस वाक्य ने अर्पित को पूरी तरह से चौंका दिया। "तुम मेरी दादी हो?" उसने मुश्किल से सवाल पूछा।
महिला ने सिर हिलाते हुए कहा, "हां, अर्पित। मैंने अपना जीवन एक गहरे राज़ को छुपाने में बिता दिया। वह राज़ तुम्हारे खून में समाया हुआ है। तुम्हारी पहचान सिर्फ एक सपना नहीं है, यह एक सच है, और तुम्हारे पास वह शक्ति है जो पूरे गांव को बदल सकती है।"
अर्पित के दिमाग में कई सवाल दौड़ने लगे। "क्या तुम सच में मेरी दादी हो? फिर तुम जीवित क्यों नहीं हो?" उसने पूछा।
महिला ने गहरी आवाज में कहा, "मैं मर चुकी हूं, लेकिन मेरी आत्मा को अपनी असंभव ताकत से लौटने का मौका मिला। मैं तुम्हे बताने आई हूं कि तुम वह शक्ति हो, जिसे मेरे परिवार ने सदियों से सहेजा है। तुम उस अंगूठी को पहचानते हो, क्योंकि वही तुम्हारी असली पहचान का प्रतीक है।"
अर्पित के दिमाग में सब कुछ घूमने लगा। "लेकिन, वह अंगूठी कहां है?" उसने सवाल किया।
महिला ने उसकी ओर एक क़दम बढ़ाते हुए कहा, "वह अंगूठी तुम्हारे पास ही है। तुम्हारे पास जो कागज था, वही तुम्हारी दिशा दिखाने वाला था। उस अंगूठी को अगर तुम खोज लेते हो, तो तुम्हें सारी सच्चाई का पता चल जाएगा। तुम्हारी शक्ति जागृत हो जाएगी।"
अर्पित का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसे यह सब समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन वह अब जानने के लिए और भी ज्यादा उत्सुक था। वह उस अंगूठी को किस तरह पा सकता था? क्या वह सच में अपने पूर्वजों की शक्ति का मालिक था?
महिला ने एक बार फिर कहा, "तुम्हारी जड़ें इस हवेली से जुड़ी हैं, और वही जगह है जहां वह अंगूठी तुम्हें मिल सकती है। तुम अब उस रास्ते पर हो, जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने तैयार किया था।"
अर्पित की आँखों में एक जलती हुई उम्मीद का ख्वाब था। उसने महिला से पूछा, "तुम मेरी मदद कैसे कर सकती हो?"
महिला ने जवाब दिया, "मेरे पास एक तरीका है, लेकिन तुम्हें ध्यान रखना होगा कि यह रास्ता बहुत खतरनाक है। तुम्हारे सामने कई मुश्किलें आ सकती हैं, लेकिन तुम सिर्फ अपने विश्वास और साहस से इस रास्ते को पूरा कर सकते हो।"
फिर, जैसे ही महिला का रूप धुंधला होने लगा, उसने आखिरी बार अर्पित की ओर देखा और कहा, "याद रखना, तुम्हारी शक्ति सिर्फ तुम्हारे हाथ में है। तुम जो चुनोगे, वही तुम्हारा भविष्य बनेगा।"
महिला की छाया धीरे-धीरे हवेली में समा गई, और अर्पित खुद को और भी अधिक अकेला महसूस करने लगा। अब उसे एक नई यात्रा पर निकलना था, एक ऐसी यात्रा जहां उसे न सिर्फ अपने परिवार के राज़ को जानना था, बल्कि अपनी असली ताकत को पहचानना भी था।
क्या वह अंगूठी सचमुच उसे उसकी असली शक्ति दे पाएगी? क्या अर्पित उस रास्ते पर जा सकेगा, जहां उसकी पहचान और शक्ति छिपी हुई थी? इसके लिए उसे अपनी डर और संकोच को पीछे छोड़कर पूरी तरह से विश्वास और साहस के साथ इस रहस्य को सुलझाना होगा।
कहानी अब और भी जटिल हो गई है। अर्पित का सफर जारी है, और उससे जुड़े राज़ अब और भी गहरे हो रहे हैं।
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