सन्नाटे में खोई हुई आवाजें - Part 3
Writer: Lucky Thakur
माया की आँखों में एक नई उम्मीद और रहस्य की तलाश थी। जैसे ही किताब से चमक फैलने लगी, वह खुद को न सिर्फ अंधेरे में, बल्कि अपनी जीवन की एक गहरी और खौ़फ़नाक सचाई में खोता हुआ महसूस करने लगी। क्या यह वही किताब थी, जिस पर उसकी माँ ने कभी हाथ रखा था? क्या उसकी माँ भी इस रास्ते पर चलकर खो गई थी? माया को लगता था कि अब उसके पास हर सवाल का जवाब था, लेकिन सच तो यह था कि यह सिर्फ एक नया सवाल था, एक ऐसा सवाल जिसे हल करने के लिए उसे और भी गहरे अंधेरे में जाना होगा।
चमक अब धीरे-धीरे फीकी हो रही थी, लेकिन उस चमक के साथ जुड़ी एक आवाज़ ने माया को फिर से चौंका दिया। "तुमने किताब खोल ली है, माया। लेकिन क्या तुम तैयार हो उन जवाबों को जानने के लिए?" यह वही आवाज़ थी, जो उसे पहले सुनाई दी थी — वह बूढ़ी औरत की आवाज़, जो अब माया के साथ हर कदम पर थी, जैसे उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गई हो।
माया ने गहरी साँस ली और किताब को कसकर पकड़ा। उसका हाथ थोड़ा काँप रहा था, लेकिन दिल में एक अजीब सा आत्मविश्वास भी था। "मैं तैयार हूँ," उसने कहा, "अब मुझे यह सब खत्म करना होगा।"
किताब के पन्ने अब अपने आप पलटने लगे थे। माया ने महसूस किया कि जैसे उन पन्नों पर कोई ताकतवर चीज़ चल रही हो, कुछ ऐसा जो उसे और उसकी सच्चाई को जानने पर मजबूर कर रहा हो। किताब का एक और पन्ना खुला और उस पन्ने पर कुछ शब्द लिखे थे — "तुम्हारी माँ ने जो खोया था, उसे तुम्हें ही ढूँढना होगा।"
माया के दिल में एक गहरी सिहरन दौड़ी। क्या उसकी माँ ने भी यही पढ़ा था? क्या उसकी माँ को भी यह समझ में आया था कि उसका खोया हुआ जीवन कहीं ना कहीं इस किताब में कैद था? क्या उसे खुद को बचाने के लिए यही किताब पढ़नी पड़ी थी?
उसकी सोच का प्रवाह टूटते हुए एक ज़ोरदार चीख़ से हुआ। एक अजीब सा भयंकर हलचल मची थी। माया ने जल्दी से मुड़कर देखा। किताब से निकलती एक धुंआ जैसी रौशनी अब कमरे के अंदर फैल रही थी, और साथ ही अजीब सी आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। वह आवाज़, जो कभी किसी इंसान की नहीं लगती थी, एक भूतिया आह की तरह उसे डराने लगी थी।
"यह सब क्या है?" माया ने हड़बड़ी में पूछा। उसका दिल जैसे ज़ोरों से धड़क रहा था, लेकिन उसे समझ में आ गया था कि अगर उसने अब तक जो भी किया, वह उसके लिए एक आखिरी मौका था।
उसने किताब को फिर से अपने हाथों में लिया और गहरे से उसे खोलते हुए कहा, "मैं अपनी माँ को ढूँढने आई हूँ, और मुझे उसे वापस लाना है।"
जैसे ही माया ने यह शब्द कहे, अचानक कमरे में बर्फ की सी ठंडक फैल गई। हर चीज़ ने एक विचित्र रूप ले लिया। किताब की चमक और बढ़ गई, और कमरे के चारों ओर रहस्यमय रोशनी छा गई। माया की आँखों के सामने अंधेरे में किसी महिला का धुंधला सा चेहरा उभरा। वह एक पल को चौंकी, फिर कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। जैसे ही वह और पास गई, उसे एक अजीब एहसास हुआ, वह महिला किसी और से नहीं, बल्कि उसकी माँ से जुड़ी हुई थी।
"माँ?" माया ने बुरी तरह से पूछा। "क्या तुम यहाँ हो?"
महिला का चेहरा धीरे-धीरे और साफ़ हुआ, और माया को एहसास हुआ कि यह कोई और नहीं, बल्कि उसकी माँ थी। उसकी आँखों में वही बेबसी और चिंता थी, जिसे माया हमेशा महसूस करती आई थी। उसकी माँ की आँखों में एक रहस्य था, जिसे माया को अब समझना था।
"माँ!" माया ने चिल्लाया। "तुम यहाँ क्या कर रही हो?"
माँ ने एक गहरी, दुःख भरी आवाज़ में कहा, "मैं तुम्हारे लिए वापस आ रही थी, लेकिन मुझे तुमसे पहले खुद को बचाना था। यह रास्ता वह नहीं है, जिस पर तुम चलने की सोच रही हो। अगर तुमने यह रास्ता लिया, तो तुम भी वही बन जाओगी, जो मैं बन गई।"
माया की आँखों में आंसू थे, लेकिन उसने फिर भी अपनी माँ से कहा, "मैं तुमसे वादा करती हूँ, माँ, मैं तुम्हारा रहस्य हल करूंगी। मैं इस अंधेरे से बाहर आऊँगी।"
उसकी माँ की आँखों में एक हल्की सी चमक आई, और फिर वह गायब हो गई। माया ने अपनी आँखों से आंसू पोंछे और महसूस किया कि अब वह उस रास्ते पर जा चुकी थी, जहाँ वापसी की कोई संभावना नहीं थी। वह आगे बढ़ी, पूरी तरह से दृढ़ संकल्प के साथ, और महसूस किया कि यह यात्रा उसकी थी, उसका भविष्य।
अब वह खुद अपने सवालों के जवाब ढूँढने जा रही थी, और यह यात्रा उसे उस अंधेरे से बाहर निकालने की थी, जहाँ कभी उसकी माँ खो गई थी। क्या माया अपनी माँ को ढूंढ पाएगी? क्या वह अंधेरे से निकल पाएगी, या फिर वह भी अपनी माँ की तरह उसी रहस्यमय स्थान में खो जाएगी?
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