सन्नाटे में खोई हुई आवाजें - Part 2
Writer: Lucky Thakur
माया ने गहरी सांस ली और धीरे-धीरे तहखाने में कदम रखा। अंधेरे में सिर्फ एक हल्की सी रौशनी झलक रही थी, और वह रौशनी जैसे उसे किसी नए रास्ते की ओर खींच रही हो। जैसे ही वह अंदर गई, उसके कानों में वह अजीब सी आवाज़ फिर से गूंजने लगी, "तुम तैयार हो?" यह आवाज़ अब माया के दिल में गहरे डर और जिज्ञासा का मिश्रण बना रही थी।
तहखाने का माहौल बहुत अजीब था। दीवारों पर पुराने चित्रों के टुकड़े थे, और फर्श पर खून के धब्बे जैसे कुछ निशान थे। माया ने उन्हें नजरअंदाज करते हुए अपने कदम आगे बढ़ाए। लेकिन जैसे ही उसने एक कदम और बढ़ाया, अचानक दरवाजे के पास कोई चीख मारी। वह एकदम चौंकी, फिर धीरे से पलट कर देखा।
"क्या तुम चाहती हो यहाँ रहकर अपने सवालों के जवाब पाना?" बूढ़ी औरत का स्वर और भी तीव्र हो गया था। "यहाँ सब कुछ नहीं है जैसा तुम्हें लगता है, माया।"
माया को महसूस हुआ कि उस अंधेरे तहखाने में वह अकेली नहीं थी। उसकी आँखों के सामने पुरानी यादें तैरने लगीं। क्या यह वही जगह थी जहां कभी उसकी माँ भी आई थीं? क्या उसकी माँ भी इसी तहखाने में खो गई थी? माया को अपनी माँ की एक झलक याद आई। जब वह छोटी थी, उसकी माँ उसे हमेशा कहती थी, "कभी भी किसी रहस्य को हल करने की कोशिश मत करना, माया। ऐसे सवालों के जवाब केवल दर्द और अंधेरे लेकर आते हैं।"
माया ने खुद को इस विचार से बाहर निकाला और सोचने लगी, "क्या मेरी माँ ने इस अंधेरे को महसूस किया था, या यह सिर्फ मेरी कल्पना है?" लेकिन उसके दिमाग में एक सवाल और था जो उसे बेचैन कर रहा था: "क्या बूढ़ी औरत सच में मेरी माँ के बारे में जानती है?"
तभी अचानक, तहखाने का दरवाजा एक जोर की आवाज के साथ बंद हो गया, और माया को महसूस हुआ कि अब उसे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। अंधेरे में वह और भी अधिक घबराई, लेकिन उसे याद आया कि उसे अपने सवालों के जवाब पाने हैं। वह रुक नहीं सकती थी।
बूढ़ी औरत का चेहरा अब और भी डरावना हो गया था, उसकी आँखों में एक रहस्यमयी चमक थी। "तुम आ गई हो," वह बोली, "अब तुम्हें सच का सामना करना होगा।"
माया ने आवाज में दम डालते हुए कहा, "मैं सच का सामना करने के लिए तैयार हूँ। मैं जो ढूँढने आई हूँ, वह मुझे मिलेगा।"
बूढ़ी औरत हंसी, "यह आसान नहीं होगा, माया। तुम्हारे सवालों के जवाब खुद तुम्हारे भीतर हैं। लेकिन क्या तुम उन जवाबों को जानने की हिम्मत रखती हो?"
माया अब और भी संजीदा हो गई। वह जानती थी कि उसे इस रहस्य को सुलझाना होगा, चाहे जो भी हो। उसके पास और कोई विकल्प नहीं था।
बूढ़ी औरत के इशारे पर, माया ने तहखाने के और अंदर कदम बढ़ाए। वहां, एक पुराना लकड़ी का चौकी दिखाई दिया, जो पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो चुका था। उस चौकी पर एक पुरानी किताब रखी हुई थी। माया ने धीरे से उस किताब को उठाया और खोलने की कोशिश की। जैसे ही उसने किताब खोली, उसके सामने पन्नों पर पुराने-अजनबी शब्द उभरने लगे। किताब में लिखा था, "जो खो गया है, वही वापस पाओगे।"
माया के हाथों में किताब थामते हुए एक कड़ा सा एहसास हुआ। क्या यह किताब उसकी माँ की थी? क्या उसकी माँ ने भी कभी इसी किताब के पन्नों को पलटा था? क्या यह वही किताब है जिसे खोजते-खोजते उसकी माँ गुम हो गई थी?
अब माया का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह किताब को पूरी तरह से खोलने का साहस जुटाती है। जैसे ही उसने अंतिम पन्ना खोला, एक सदी पुरानी आवाज़ गूंज उठी, "तुम वही हो जो हमें छोड़ गए थे। तुम यहाँ से बाहर नहीं जा सकते, जब तक तुम अपने अतीत को नहीं समझते।"
यह आवाज़ माया के अंदर गहरे तक समा गई। अब उसे समझ में आने लगा कि उसके जीवन के इतने सालों से वह जिस अंधेरे में खोई हुई थी, वह किसी और का नहीं, बल्कि उसकी अपनी डरावनी सच्चाई थी। क्या वह अपनी माँ के पीछे के रहस्य को समझ पाएगी? क्या वह अपनी माँ के खोने की कहानी को खत्म कर पाएगी?
लेकिन अचानक, किताब से एक हल्की सी चमक निकली और माया के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान फैल गई। क्या यह सच में उसकी यात्रा का अंत था, या फिर यह एक और मोड़ था, जो उसे एक और खोज के लिए तैयार कर रहा था?
आगे की कहानी पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें:
[आगे की कहानी पढ़े - Read More]
- Get link
- X
- Other Apps
- Get link
- X
- Other Apps

Comments
Post a Comment