"उलझन, सुलझ गई"
शादी के बाद दिया मुंबई आ गई थी, और उसका बड़ा भाई आदित्य, जो अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था, घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल रहा था। अनुज के पिता अभी भी जॉब में थे, और रिटायर होने के बाद सभी ने साथ में रहने का प्लान किया था।
एक दिन ऑफिस से आते ही दिया के फोन की घंटी बजी। देखा तो भाई आदित्य का कॉल था।
"हां आदित्य भईया, बोलिए," दिया ने कहा।
"दिया, मुझे बड़ी उलझन में फंस गया हूं," आदित्य की आवाज में चिंता थी।
"क्या हुआ भईया, बताओ," दिया ने फिक्र जताते हुए पूछा।
"तुम तो जानती हो, पापा ने लोन लेकर हमें पढ़ाया है। अब मुझे अमेरिका में एक शानदार जॉब मिल रहा है, लेकिन मैं चाहता हूं कि पापा के लिए कुछ बड़ा करूं। पापा दो साल में रिटायर हो जाएंगे, और इन दो सालों में मैं कुछ बड़ा करना चाहता हूं, पर..." आदित्य की आवाज में असमंजस था।
"पर क्या भईया?" दिया ने उत्सुकता से पूछा।
"क्या तुम मेरा साथ दोगी? मैं विदेश जाना चाहता हूं, लेकिन मैं जानता हूं कि घर की जिम्मेदारी तुम पर है।"
"हां भईया, मैं समझ गई। आप निश्चिंत होकर जाएं, मैं सबका ध्यान रखूंगी, पापा-मम्मी का," दिया ने पूरी तरह से विश्वास दिलाया।
आदित्य निश्चिंत होकर विदेश चला गया। दिया अपने माता-पिता, सास-ससुर, और घर की जिम्मेदारियों का पूरा ध्यान रखती। आदित्य भी रोजाना अपने माता-पिता से बात करता और उनकी जरूरतों का ख्याल रखता। इस तरह दो साल बीत गए।
आदित्य की शादी हो गई, और उसके माता-पिता भी रिटायर हो गए। अब नया संकट यह था कि मां की तबियत बिगड़ने लगी, और आदित्य पर लोन का बोझ था, जिसके लिए उसे विदेश में रहकर बहुत पैसा कमाना था।
दोनों भाई-बहन ने आपस में विचार-विमर्श किया। उसी सोसाइटी में, जहां दिया और अनुज रहते थे, उन्होंने एक नया दो बेडरूम फ्लैट किश्तों पर खरीदा और पापा-मम्मी को वहां शिफ्ट कर दिया। अब उनके सिर से एक बड़ी चिंता दूर हो गई थी।
चार महीने बाद, अनुज के माता-पिता भी रिटायरमेंट के बाद मुंबई आ गए। दिया और अनुज ने बड़ी समझदारी से उन्हें मुंबई के माहौल में एडजस्ट कराया। सुबह दोनों मम्मियां और पापा मॉर्निंग वॉक पर जाते, फिर योगा सेंटर जाते, और लौटते वक्त दिया के माता-पिता के फ्लैट में जाकर गर्म चाय का आनंद लेते। उन्हें एक दूसरे का साथ बहुत अच्छा लगता था, और जल्द ही वे सभी अच्छे दोस्त बन गए थे।
अब तो ऐसा होने लगा कि जब भी दिया और अनुज संडे को बाहर जाते, तो चारों माता-पिता भी अपना प्रोग्राम बना लेते। अब यह हाल था कि चारों का एक-दूसरे के बिना मन ही नहीं लगता था। आदित्य भी विदेश में निश्चिंत था क्योंकि दिया की वजह से वह भी अपने माता-पिता का सही तरीके से ध्यान रख पा रहा था।
दिया और अनुज ने चारों धाम की यात्रा के लिए रिजर्वेशन करवा दिया और पूरी तैयारी के साथ माता-पिता को भेज दिया। वो बुढ़ापा, जिससे वे डर रहे थे, अब इतना व्यवस्थित और खूबसूरत हो रहा था कि उन्हें यह उम्मीद भी नहीं थी।
अब दीवाली का दिन था, और आदित्य और मीता के आने की खबर थी। सभी बहुत खुश थे क्योंकि मीता खुशखबरी देने वाली थी। टैक्सी रुकी, आदित्य और मीता घर आए, और सभी के चरण स्पर्श करने के बाद आदित्य ने कहा, "मम्मी, पापा, दिया... अब मैं यहीं रहूंगा।"
मोरल:
समझदारी, प्यार और जिम्मेदारी से रिश्ते मजबूत बनते हैं। जीवन की उलझनों का हल कभी अकेले नहीं निकलता, बल्कि परिवार के साथ मिलकर, एक-दूसरे का साथ देकर उसे सुलझाया जा सकता है।
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