"माँ का मोह और सच्चाई का पर्दा"
लेखक: Lucky Thakur
आज सारी रात सुनीता की नींद उड़ी रही। वह एक पल के लिए भी सो नहीं पाई। मन में तरह-तरह के विचार उमड़ रहे थे, और उसका दिल भारी हो गया था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे। उसकी तो सारी पूंजी ही लुट गई थी। अब वह किससे मदद मांगे? किसे बताये, और अगर वह चुप रही तो कब तक वह छुपाए रख पाएगी? एक दिन तो सभी को यह सच पता ही चलेगा। तब वह क्या जवाब देगी? उसने खुद को सोते-सोते बहुत बार कहा कि बेटी के मोह में उसने इतनी बड़ी गलती क्यों की। क्या हो गया था उसकी सोच को? क्यों वह अपने बच्चे के लिए हमेशा अंधी बनी रही?
सुनीता ने खुद से सवाल पूछा, “क्या मैं सच में अपनी बेटी के मोह में सही-गलत का फर्क भूल चुकी थी?” उसने कभी भी अपनी बेटी सुरुचि की आदतों और स्वभाव पर ध्यान नहीं दिया। उसे महसूस ही नहीं हुआ कि उसकी बेटी के व्यवहार में कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी है। वह हमेशा उसे एक आदर्श बेटी और एक आदर्श इंसान मानती रही। हर किसी की आलोचना को वह नजरअंदाज कर देती और सोचती कि यह सब सिर्फ बेटी की आलोचना करने के लिए था। उसकी आँखों में तो सुरुचि ही सबसे अच्छी और सबसे सुखी लड़की थी।
वह बेटी के प्रति अपने अंधे विश्वास में कुछ इस तरह डूबी हुई थी कि जब कोई उसे सच्चाई से परिचित कराने की कोशिश करता तो वह उसे झूठा और बुरा भला कह देती। उसे लगता कि दुनिया भर के लोग उसकी बेटी के खिलाफ हैं, और वे सिर्फ उसे नीचा दिखाना चाहते हैं। सुनीता की दृष्टि में सुरुचि की सारी समस्याएं और संघर्ष केवल दूसरों की ईर्ष्या और जलन के कारण थे। वह हमेशा यही सोचती रही कि सब कुछ ठीक है, बस लोग उसे गलत समझ रहे हैं।
लेकिन अब जब सच सामने आया, तो सुनीता का दिल टूटा हुआ था। उसने देखा कि वह सारी उम्र जिस बेटी को आदर्श मानती रही, वही बेटी अब उसकी जिंदगी के सबसे बड़े संकट का कारण बन गई थी। शुरू में उसे यह मानने में कठिनाई हुई कि वह अपनी बेटी के बारे में इतनी गलत सोच रही थी। उसकी सच्चाई को समझना उसके लिए एक कठिन अनुभव था।
वह रातभर यही सोचती रही कि उसने अपनी बेटी को कितना अधिक प्यार दिया था। क्या वही प्यार अब उसका सबसे बड़ा शोषण बन गया था? उसने कभी सोचा ही नहीं था कि उसकी बेटी को प्यार देना भी कभी गलत हो सकता है। लेकिन अब उसे यह समझ में आ रहा था कि कभी-कभी हमें अपनी आँखों से पर्दा हटाकर सच्चाई देखनी पड़ती है, भले ही वह सच्चाई हमें दर्द देती हो।
सुनीता की सोच अब बदल चुकी थी। वह यह समझ चुकी थी कि माँ का प्यार कभी भी अंधा नहीं होना चाहिए। अगर हमें अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदार होना है, तो हमें उनकी गलतियों को भी पहचानने और समझने की जरूरत है। बेटी के लिए किए गए हर एक अच्छे काम का अगर वह सही दिशा में उपयोग नहीं करती, तो क्या वह प्यार सच में सही था? क्या उस प्यार ने उसे बुराई से बचाया था या फिर उसकी गलत आदतों को और बढ़ावा दिया था? यह सवाल अब सुनीता के मन में गूंज रहे थे।
अब सुनीता को यह समझ में आ रहा था कि अपने बच्चों को सही दिशा में ले जाने के लिए हमें कभी-कभी कठोर कदम भी उठाने पड़ते हैं। अगर बेटी या बेटा अपने मार्ग से भटक रहे हैं, तो केवल प्यार करने से कुछ नहीं होगा। सच्चे माता-पिता वही होते हैं जो बच्चों को उनके रास्ते की सच्चाई दिखाते हैं, चाहे वह कड़ी क्यों न हो।
सुनीता अब यह तय कर चुकी थी कि वह अपनी बेटी से एक स्पष्ट और ईमानदार बातचीत करेगी। उसे अब यह समझ में आ चुका था कि अगर वह अपनी बेटी को सही दिशा में नहीं ले आई, तो उसके जीवन में और भी कठिनाइयाँ आ सकती थीं। और सुनीता को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गई थी कि प्यार सिर्फ बिना सोचे-समझे किया गया प्यार नहीं होना चाहिए। प्यार में सच्चाई और जिम्मेदारी का होना भी उतना ही आवश्यक है।
आज सुनीता ने महसूस किया कि बेटी के मोह में अपनी आँखें बंद करना ही सबसे बड़ी गलती थी। अब वह अपने जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार थी। अपनी बेटी को वह सच्चाई बताएगी, जिससे शायद वह खुद भी घबराए, लेकिन यह निर्णय उसके और उसकी बेटी के भले के लिए होगा।
मोरल: बच्चों के प्रति हमारे प्यार का कोई अंत नहीं होना चाहिए, लेकिन हमें कभी भी अंधे विश्वास में अपने बच्चों की गलतियों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। सही प्यार वही है जो बच्चों को उनके अच्छे और बुरे की पहचान कराए, और उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन दे।

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