दोस्ती और विश्वास - एक कठिन परीक्षा
लेखक: Lucky Thakur
"छोड़ न यार करसन, उसकी कोई बात मुझसे मत कर। अब मैं उस कलमुंहे का मुंह भी नहीं देखना चाहता। अब तो उसे दोस्त कहने में भी शरम आती है।" कान्हा ने दुखी मन से कहा, जैसे उसके दिल पर गहरी चोट लगी हो।
करसन ने अपने दोस्त को समझाते हुए कहा, "ऐसा मत कह यार कान्हा। बुरा ही सही, पर दिनेश हमारा बहुत अच्छा दोस्त है। दोस्ती की खातिर बस एक बार चल कर मिल लेते हैं। फिर दोबारा उससे मिलने के लिए कभी नहीं कहूंगा। एक बार मिलने से मेरी आत्मा को थोड़ा संतोष मिल जाएगा।"
"तू इतना कह रहा है तो चलो एक बार मिल आते हैं, पर इस मिलने से कोई फायदा नहीं है। ऐसे आदमी से क्या मिलना, जो इस तरह का घिनौना काम करे। मेरे खयाल से उससे मिलकर तकलीफ ही होगी," कान्हा ने दुखी स्वर में कहा।
"कुछ भी हो, मैं एक बार उस से मिलना चाहता हूं," करसन ने अपनी जिद दिखाई।
अगले दिन, दोनों दोस्त अहमदाबाद गए और दिनेश से मिलने के लिए जेल पहुंचे। जेल में मिलने की जो प्रक्रिया होती है, उसे पूरा कर दोनों दोस्त दिनेश से मिलने के लिए अंदर गए। दिनेश की हालत देखकर कान्हा और करसन की आँखों में आंसू आ गए।
"यह सब क्या है, दिनेश?" कान्हा ने घबराए हुए स्वर में पूछा।
दिनेश के चेहरे पर तनाव था, लेकिन उसकी आँखों में दर्द भी था। दाहिने हाथ की हथेली से आंसू साफ करते हुए उसने कहा, "भाई कान्हा, मैं एकदम निर्दोष हूं। मैंने कुछ नहीं किया। मैं कसम खाकर कह रहा हूं कि इस बारे में मैं कुछ नहीं जानता।" यह कहते हुए दिनेश फफक कर रो पड़ा।
कान्हा ने गहरी नज़र से उसे देखा और फिर सवाल किया, "जब तूने कुछ किया ही नहीं था तो फिर थाने और अदालत में यह क्यों कहा कि सविता के साथ तूने ही दुष्कर्म कर के उसकी हत्या की है?"
दिनेश का चेहरा और भी उतरा हुआ था। उसने सिर झुका लिया और फिर धीमे स्वर में कहा, "पुलिस ने मुझे मार-मार कर कहलवाया है कि मैंने यह अपराध किया है। थानाप्रभारी ने कहा कि अगर मैंने उसकी बात नहीं मानी तो वह मेरे सारे दोस्तों को पकड़ कर जेल भिजवा देगा। मजबूरन मुझे वह सब कहना पड़ा, जो पुलिस ने कहा। क्योंकि मैं तो फंसा ही था। मैं नहीं चाहता था कि मेरे दोस्त भी फंसें। तुम्हीं बताओ कि ऐसे में मैं क्या करता। पुलिस की बात मानने के अलावा मेरे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था।"
कान्हा का दिल चुक गया, लेकिन वह कुछ नहीं कह सका। दिनेश की मजबूरी ने उसे झकझोर दिया था। वह समझ गया था कि यह सब सच्चाई नहीं थी, पर उसने जानबूझ कर अपराध किया, ऐसा तो कोई भी नहीं कह सकता था।
दिनेश कुछ और कहता, तभी जेल के सिपाही ने आकर कहा, "चलिए भाई, आप लोगों का मिलने का समय खत्म हो चुका है।"
कान्हा ने गहरी सांस ली और फिर मुड़ते हुए कहा, "दोस्त, तू धीरज रख, अगर तूने यह अपराध नहीं किया है तो मैं असलियत का पता लगा कर रहूंगा।"
यह कहकर कान्हा और करसन जेल से बाहर निकल गए, लेकिन दोनों के मन में सवालों की एक लंबी लिस्ट थी। क्या दिनेश सच कह रहा था? क्या वह वास्तव में निर्दोष था?
यह कहानी एक गहरी सीख देती है कि कभी-कभी हमें अपने दोस्तों और प्रियजनों के लिए कठिन रास्ते पर चलने की जरूरत पड़ती है, खासकर जब वे गलत परिस्थितियों में फंस जाते हैं। कान्हा और करसन ने दिनेश से मिलकर उसकी स्थिति को समझा और यह भी महसूस किया कि दोस्ती केवल अच्छे समय में ही नहीं, बल्कि बुरे वक्त में भी परखी जाती है।
कभी-कभी बाहरी दुनिया के सामने हमारी समझ और विश्वास की परीक्षा होती है, लेकिन सच्ची दोस्ती यह है कि हम किसी भी स्थिति में अपने मित्र का साथ दें, बेशक हमें भी मुश्किलों का सामना करना पड़े।
मोरल: दोस्ती में विश्वास सबसे महत्वपूर्ण होता है। हमें हमेशा यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि कोई दोस्त क्यों ऐसा कदम उठाता है, बजाय इसके कि हम बिना समझे उसे दोषी ठहरा दें। दोस्ती का असली मतलब है एक-दूसरे के साथ खड़ा होना, जब किसी को सबसे ज्यादा मदद की जरूरत होती है।

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