"सास-बहू का अनकहा सच"
लेखक: लकी ठाकुर
"क्या बात है स्मिता जी, आप आजकल पार्क नहीं आ रहीं?" नंदिता ने अपनी पार्क में मिलने वाली मित्र के घर आकर पूछा।
"बस नंदिता जी, थोड़ा तबियत नासाज चल रही है आजकल," स्मिता ने बुझे स्वर में कहा।
"हां, थोड़ा मौसम और थोड़ा उम्र का तकाज़ा भी तो है। मेरी तबियत का भी कोई भरोसा नहीं रहता," नंदिता बोली, लेकिन उसकी आंखों में एक हल्की सी चिंता थी।
"मांजी, जरा इधर आना!" स्मिता कुछ बोल पाती, उससे पहले दरवाजे पर आई उनकी बहु नताशा ने आवाज़ दी।
"अभी आई मैं!" स्मिता ने नंदिता से कहा और उठकर चली गई। नंदिता ने महसूस किया कि स्मिता थोड़ी घबराई सी लग रही हैं।
वो बोरिया उठाती हुई चल दीं, लेकिन तभी नताशा की आवाज़ सुनाई दी। "ये क्या है मांजी, मेरा घर धर्मशाला नहीं जो आपकी कोई भी सहेली यहाँ चली आती है। मैं कह देती हूं, ये सहेलीपना बाहर तक सीमित रखिए, आपको झेल रहे हैं, इतना काफी नहीं है क्या!" नताशा सास से बहुत रूखे स्वर में बोली।
स्मिता जी सिर झुका कर बोलीं, "माफ़ करना बहू, मैं उसे बोल दूंगी," क्योंकि वो जानती थीं कि बहु ने जो कुछ कहा है, इतनी जोर से बोला है कि नंदिता ने जरूर सुन लिया होगा।
स्मिता जी सिर झुकाए, अपने कमरे में चली गईं। नंदिता ने इसे देखा और मुस्कुरा दी। जब वह कमरे में दाखिल हुईं, तो नंदिता ने कहा, "चलिए स्मिता जी, थोड़ा घूम आते हैं, आपको अच्छा लगेगा।"
स्मिता जी बिना कुछ बोले चल दीं। वह सोच रही थीं, अब पार्क में सबको पता चल जाएगा कि मेरी बहु मेरे साथ कैसा व्यवहार करती है। क्योंकि अभी तक तो सब एक-दूसरे को पार्क के जरिए ही जानते थे। किसी का किसी के घर नहीं आता था। आज भी नंदिता जी स्मिता जी के कई दिन से पार्क ना आने के कारण उन्हें खोजते हुए आई थीं।
पार्क में पहुंचते ही स्मिता जी का मन हल्का हो गया। ताजगी का अहसास हुआ और नंदिता की संगत में उनके पुराने दिनों की यादें ताजा होने लगीं। वह दिन जब नंदिता और स्मिता जी पार्क में घंटों बैठकर बातें किया करती थीं, उसी समय स्मिता जी की बहु नताशा का व्यवहार उनके दिल को बहुत चुभने लगा था।
नंदिता ने स्मिता जी के मन की बातों को समझ लिया। वह धीरे से बोलीं, "स्मिता जी, कभी-कभी हमें सच्चाई का सामना करना पड़ता है। हम जितना भी छुपाने की कोशिश करें, एक दिन वो बाहर आ ही जाती है।"
स्मिता जी ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया। "क्या सच है, नंदिता जी। मैं अपनी बहु को समझाती हूं कि सास-बहू का रिश्ता बहुत खास होता है, लेकिन वह कभी समझ नहीं पाती। शायद मेरे भीतर की कमजोरी ही इसका कारण बन रही है। मैं चाहती हूं कि हमारा रिश्ता ऐसा हो जैसे एक माँ और बेटी का होता है, लेकिन..."
नंदिता ने उनकी बातों को बीच में काटते हुए कहा, "स्मिता जी, कभी-कभी हमें अपनी शक्ति और सम्मान को खुद पहचानना पड़ता है। और अगर आपकी बहु को आपके प्रेम और सम्मान का एहसास नहीं होता, तो आपको खुद को कमजोर नहीं समझना चाहिए।"
स्मिता जी को नंदिता की बातों ने एक नई सोच दी। वह सोचने लगीं कि क्या सच में उनकी कमजोरी ही नताशा के व्यवहार का कारण है? क्या उन्होंने खुद को कभी अपनी बहु के सामने साबित नहीं किया?
कुछ दिनों बाद, स्मिता जी ने एक ठानी हुई मंशा बनाई। उन्होंने अपनी बहु से खुलकर बात करने का निर्णय लिया। नंदिता जी के साथ एक शाम पार्क में बैठी, स्मिता जी ने खुद को तैयार किया और बहु से कहने के लिए मन में शब्द तैयार किए।
"नताशा, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है," स्मिता जी ने एक दिन बहु से कहा।
नताशा थोड़ी चौंकी, "क्या बात है मांजी?"
स्मिता जी ने गहरी सांस ली और कहा, "मैंने हमेशा तुमसे प्यार और सम्मान की उम्मीद की है। लेकिन जो बात मैंने महसूस की है, वह यह है कि मैं अपनी स्थिति को लेकर कभी भी मजबूत नहीं रही। और यह मेरी गलती है।"
नताशा चुप रही। उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उसकी आंखों में कुछ था, एक हल्की सी नरमी।
"मुझे समझाओ नताशा," स्मिता जी बोलीं, "क्या मैं तुम्हें अपने अधिकारों को लेकर किसी बात पर जोर डालने का अधिकार नहीं रखती?"
नताशा थोड़ी देर चुप रही, फिर उसने कहा, "मांजी, मुझे लगता है कि मैंने जो किया, वह सही नहीं था। मुझे आपकी भावना को समझने की जरूरत थी, लेकिन मैंने नहीं किया। मैं माफी चाहती हूं।"
स्मिता जी के दिल में एक हल्की सी राहत हुई। उन्होंने कहा, "नताशा, हम सब इंसान हैं, हमारी भावनाएं और गलतियां कभी-कभी हमें अपनी राह बदलने पर मजबूर करती हैं। लेकिन हमें एक-दूसरे का सम्मान और प्यार हमेशा बनाए रखना चाहिए।"
कहानी से शिक्षा:
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि रिश्तों में कभी भी अपनी भावनाओं को छुपाना नहीं चाहिए। अगर हमें किसी से प्यार और सम्मान की उम्मीद है, तो हमें खुद भी वही दिखाना होगा। संवाद और समझ के बिना कोई भी रिश्ता मजबूत नहीं हो सकता।
जब हमें लगता है कि हम किसी रिश्ते में कमजोर हैं, तो हमें अपनी शक्ति को पहचानने की जरूरत है। कभी-कभी थोड़ी सी समझ और बहस से रिश्तों में सुधार आ सकता है।

Comments
Post a Comment