"दिल की खोई हुई राह"
Writer: Lucky Thakur'
शिखा ने कमरे में घुसते ही दरवाजा बंद कर लिया और थकान से पलंग पर गिर पड़ी। उसकी आँखों में एक अजीब सी उलझन थी, जैसे वह किसी बडे़ सफर के बाद लौट रही हो, लेकिन सफर का पता ही न हो। नये घर में कदम रखा था, पर उसकी आत्मा कहीं खोई हुई सी लग रही थी। "क्या मैं सही हूं?" ये सवाल बार-बार उसकी सोच में उठ रहा था। आज की रात कुछ अलग थी, कुछ ऐसा था जो वह समझ नहीं पा रही थी। उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं, और उसे पता था कि उसे अब अपने विचारों में खोने का समय मिल गया है।
शिखा ने देखा कि पूरे कमरे में हल्की सी पीली रोशनी थी। पंखा अपने शोर से कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा बना रहा था। वह अजनबी सी घबराहट में घिरी हुई थी, जैसे उसकी पूरी दुनिया पल भर में उलट कर रख दी हो। शादी के बाद एक महीना हो चुका था, लेकिन वह फिर भी अपने आपको अकेला महसूस कर रही थी। परिवार के हर सदस्य का फोन आता और सवाल भी वही होते: "कैसा है शेखर? सब ठीक है न?" शिखा हमेशा एक ही जवाब देती थी, "हां, सब ठीक है," लेकिन अंदर से वह खुद को खोखला महसूस कर रही थी।
विवाह के पहले उसकी ज़िंदगी कितनी खुशहाल थी। पढ़ाई, खेल-कूद, दोस्तों के साथ बिताए गए पल—ये सब कुछ था, जो अब ख्वाब सा लगता था। फिर एक दिन, शैलेश से शादी तय हो गई। यह रिश्ता उसके परिवार का सपना था, और वह अपनी ज़िंदगी में एक अच्छा साथी पाने की उम्मीद कर रही थी। मगर जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, उसे एहसास होने लगा कि वह जो सोच रही थी, वह कहीं न कहीं गलत था।
शादी के बाद के महीने वैसे नहीं थे, जैसे शिखा ने कल्पना की थी। शैलेश का व्यवहार दिन-ब-दिन कठोर होता जा रहा था। शुरुआत में वह उसे समझता, उसका ख्याल रखता था, लेकिन अब वह दूरी बनाता जा रहा था। ससुराल में उसे अपने अस्तित्व को ढूंढ़ने में संघर्ष करना पड़ रहा था। शिखा को लगता कि कहीं न कहीं उसकी उम्मीदें टूट चुकी थीं।
एक दिन, जब शिखा अपने कमरे में अकेली थी, उसे अपनी सास की आवाज़ सुनाई दी। वे उसे बुरी तरह से झिड़क रही थीं, "तुमने हमारी उम्मीदों के हिसाब से क्या किया है?" शिखा चुपचाप सुन रही थी, लेकिन भीतर से टूट चुकी थी। शेखर और उसके परिवार ने उसे हर कदम पर यह महसूस कराया कि वह सिर्फ एक जिम्मेदारी थी, एक सहायक, न कि उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा।
शिखा के मन में सवालों का तूफान था। क्या वह सही कर रही थी? क्या उसकी ज़िंदगी का यह हिस्सा उसे खुश रख पाएगा? क्या वह इस रिश्ते में अपने आप को पा सकेगी?
एक दिन शिखा ने अपने दिल की बात शेखर से कह दी, "क्या हम दोनों के बीच कुछ बदल सकता है?" शेखर का चेहरा बदल गया, लेकिन उसने धीरे से कहा, "तुम जो चाहो, वही कर सकती हो।" लेकिन शिखा को वह जवाब समझ में नहीं आया। वह जानती थी कि शेखर भी अपनी उलझनों में फंसा हुआ था।
वह अपने कमरे में लौट आई और कमरे के कोने में लगे मकड़ी के जाले को देखा। जाले में फंसी हुई मकड़ी धीरे-धीरे खिसक रही थी, और शिखा को महसूस हुआ कि उसका जीवन भी कुछ उसी तरह फंसा हुआ था। क्या उसे जाले की तरह इस उलझन से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा?
उसने खुद से वादा किया कि वह खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करेगी। शिखा जानती थी कि वह अब अपनी ज़िंदगी का एक नया रास्ता ढूंढ़ने में लगी थी, और यह रास्ता आसान नहीं होने वाला था।
वह धीरे-धीरे अपने आत्मविश्वास को फिर से जगाने की कोशिश कर रही थी। उसने शेखर से दूरी बना ली थी, लेकिन अब वह खुद को समझाने और जीवन को नए नजरिए से देखने की कोशिश कर रही थी। शिखा ने शेखर के बारे में सोचा कि क्या वह कभी समझेगा कि वह भी एक इंसान है, जिसकी अपनी इच्छाएं हैं, और उसका भी हक है अपने जीवन को जीने का।
लेकिन शिखा के मन में अभी भी एक सवाल था, "क्या वह कभी शेखर के साथ सही मायने में खुश हो पाएगी?"
वह जानती थी कि समय के साथ कई चीजें बदल सकती हैं, और जीवन उसे अपनी सही राह पर ले जाएगा। वह चाहती थी कि उसकी कहानी एक मोड़ पर बदल जाए, और वह फिर से वह लड़की बन सके, जो कभी खुशियों से भरी हुई थी।
लेकिन एक और सवाल था—क्या वह शेखर को बदल पाएगी या यह रिश्ता टूट जाएगा?
यही तो था, वह मोड़, जिस पर शिखा को खड़ा होना था, और आगे का रास्ता वही तय करेगा, जो उसने अपने दिल की सुनकर कदम बढ़ाया था।
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