"रिश्तों की उलझन: एक दिलचस्प यात्रा"
लेखक: लकी ठाकुर
आज से लगभग 6-7 साल पहले जब पहली बार तुम्हारा फोन आया था, तो मुझे यह बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि तुम एक खिलाड़ी से कहीं बढ़कर होगी। तुम्हारे साथ खेल खेलने की कल्पना भी मैंने कभी नहीं की थी। मैं तो वॉलीबॉल को ही सबसे अच्छा खेल मानता था। बाकी खेलों में बचपन में कभी ज्यादा हाथ नहीं आजमाया। गुल्ली-डंडा, आइस-पाइस या चोर-सिपाही जैसे खेलों में भी मैं अच्छा नहीं था। वॉलीबॉल स्कूल के दिनों में था, जब कक्षा 6 से 8 तक मैं अपनी स्कूल टीम का हिस्सा बना था। देवीपाटन के जूनियर हाईस्कूल में उस समय वॉलीबॉल प्रतियोगिता की शुरुआत हुई थी, और कैसे, मुझे टीम में जगह मिल गई। हालांकि, यही खेल मुझे ज्यादा आकर्षित नहीं करता था, लेकिन फिर भी उसमें भाग लिया।
जब मैं पत्रकारिता में आया, तो खेलों के बारे में लिखना मेरा शौक बन गया। शायद मैंने जितने लेख खेलों पर लिखे थे, उतने किसी और विषय पर नहीं। मुझे जितने खेल पसंद थे, उनके बारे में मैंने बहुत लिखा। यह भी शायद तुम्हारा ही असर था, क्योंकि तुम्हारी बातचीत ने मुझे हर विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया। अब मैं खुद को खेल विशेषज्ञ समझता था, लेकिन तुम तो मुझसे भी बड़ी खिलाड़ी निकलीं। तुमने रिश्तों का खेल खेलने में एक अलग ही माहिरता दिखाई।
6-7 साल पहले, जब तुमने पहली बार फोन किया था, तो मेरी सोच कुछ अलग थी। तुम्हारी आवाज सुनकर मैं थोड़ा चौंका था, ‘हैलो सर, मेरा नाम दिव्या है, दिव्या शाह। अहमदाबाद से बोल रही हूं। आप का लिखा हुआ हमेशा पढ़ती रहती हूं।’ मेरी प्रतिक्रिया थी, ‘जी दिव्याजी, नमस्कार! मुझे बहुत खुशी हुई आपसे बात करके। कहिए, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं?’ तुमने कहा, ‘कुछ नहीं सर, मैं सिर्फ आपकी फैन हूं। मैंने फेसबुक से आपका नंबर निकाला। सोच रही थी आपसे बात करूं।’
तुम्हारी बातों में आत्मीयता थी। मुझे यह बहुत अच्छा लगा। लेकिन मैं लड़कियों और महिलाओं के मामले में थोड़ा संकोची था, इसलिए मैं दूरी बनाए रखना चाहता था। मुझे डर था कि कहीं मेरी लोकप्रियता से जलकर कोई मुझसे कुछ गलत न करवा ले। यही कारण था कि मैं ज्यादा बातचीत नहीं करता था। लेकिन तुम्हारी आवाज में जो गर्मजोशी थी, उसने मेरे सारे संकोच को तोड़ दिया।
उस दिन के बाद, हम दोनों की बातें होती रहीं, साहित्य, समाज और कई तरह की बातें। मुझे याद है, तुमने अपने नाना के बारे में बताया था। वे द्वारका के एक बड़े महंत थे, और तुम्हारा उनसे इमोशनल लगाव था। तुम्हारी बातें सुनकर मुझे तुम्हारी मासूमियत और भावनाओं की गहराई का अहसास हुआ। मैं तुम्हारी ओर आकर्षित हो गया था, लेकिन यह आकर्षण आत्मिक था, दोस्ती का था। उम्र में काफी अंतर होने के बावजूद, तुम्हारी बातें मुझे दिल से जुड़ी हुई लगती थीं। तुम्हारी आवाज में एक मिठास थी, जो मेरे दिल को बहुत भाती थी।
हमारी पहली मुलाकात अहमदाबाद स्टेशन पर हुई थी। तुम और मैं चाय की एक टपरी पर बैठे थे। चाय बहुत खराब थी, लेकिन तुम्हारे साथ बैठकर वह सब अच्छा लग रहा था। उस दिन मैंने तुम्हें एकदम वैसे ही पाया, जैसे मैंने सोचा था। तुम सीधी-सादी, प्यारी और मासूम थी। तुम्हारा फैशन और हावभाव बहुत ही दिलचस्प था। एक किशमिशी रंग का सूट, छोटे से पर्स और खूबसूरत चप्पलें—सच में, तुम दिलकश लग रही थी। मैं तुम्हें देखते ही रह गया, लेकिन तुम बहुत संकोची और खुद्दार महसूस हो रही थीं।
कुछ महीनों बाद, तुमने मुझसे कहा, ‘सर, क्या आप अहमदाबाद में मेरे लिए किसी नौकरी का इंतजाम कर सकते हैं?’ मैं यह सुनकर हैरान था। तुम्हारी उम्र बहुत कम थी, और मुझे लगता था कि तुम्हें नौकरी की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। मैं यह सोचने लगा कि इस उम्र में कौन अपनी बेटी को नौकरी करने के लिए शहर भेजेगा? और क्या तुम्हारी हालत ऐसी है कि तुम्हें नौकरी की जरूरत हो? बहुत से सवाल मेरे मन में उठे, लेकिन मैंने कभी तुम्हें वह सब नहीं पूछा।
फिर, एक दिन ऐसा हुआ कि तुम फिर से मेरे जीवन में आईं। इस बार पूरी तरह से अलग तरीके से, धड़धड़ाते हुए और तेज़ी से। इस बार मेरी भावनाएं पूरी तरह से बदल गईं। तुम्हारे प्यार ने मुझे एक नई दुनिया में प्रवेश कराया। तुम मेरी जिंदगी में इंद्रधनुष के रंगों की तरह आईं। मुझे लगा जैसे तुम्हारी आवाज मेरे दिल की धड़कन बन गई है। तुम जब भी गाती, तो मैं सबकुछ भूल जाता था। तुम्हारी हंसी, तुम्हारी बातें—सिर्फ तुम ही थी मेरे जीवन में।
लेकिन फिर, अचानक सब कुछ बदल गया। तुमने मुझसे बात करना कम कर दिया। फोन पर उपेक्षा शुरू हो गई। तुम्हारे व्यवहार में एक ठंडक सी आ गई। तुम्हारी हंसी अब उतनी प्यारी नहीं लगती थी। तुम्हारे संदेशों में अब कोई गर्मजोशी नहीं थी। मुझे लगा जैसे मैं एक खेल का हिस्सा बन गया, जिसका कोई उद्देश्य नहीं था। तुम्हारी उपेक्षा ने मेरे अंदर एक टूटन का एहसास किया। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरी पूरी ताकत खत्म हो गई हो, जैसे मैं किसी खाली जगह में खो गया हूं।
मैं तुम्हारे प्रति अपनी भावनाओं को फिर से समझने की कोशिश कर रहा था, लेकिन ऐसा लग रहा था कि अब तुम्हारे पास मेरे लिए कोई जगह नहीं रही। तुमने मेरी भावनाओं को एक तरफ कर दिया था, जैसे मेरे दिल में किसी शीशे की तरह कुछ टूट गया हो।
आखिरकार, मैं समझ गया कि रिश्तों में कभी-कभी किसी को समझ पाना और किसी को खो देना, दोनों ही बहुत कष्टदायक होते हैं। हमें कभी भी किसी रिश्ते की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, लेकिन यह भी जरूरी है कि हम अपने आत्मसम्मान को बचाए रखें। रिश्तों की उलझन कभी-कभी हमें इस कदर प्रभावित कर देती है कि हम अपने खुद के अस्तित्व को खो बैठते हैं।
मोरल:
इस कहानी से यह सीख मिलती है कि रिश्तों में विश्वास और सम्मान दोनों जरूरी होते हैं। अगर एक पक्ष दूसरे की भावनाओं का आदर नहीं करता, तो रिश्ता कहीं न कहीं टूट जाता है। हमें हमेशा अपनी भावनाओं को समझने और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने की जरूरत होती है।

Comments
Post a Comment