"बूढ़ी अम्मा की उदासी"
लेखक: Lucky Thakur
आज बूढ़ी अम्मा बहुत उदास और निराश हैं। उनकी आँखों में एक गहरी थकान छिपी है, जैसे ज़िन्दगी ने उन्हें अपने साये में बहुत दूर तक घसीट लिया हो। कहने को तो उनके चार बेटे हैं, लेकिन किसी को भी इतनी फुर्सत नहीं कि वह अपनी बूढ़ी अम्मा के पास समय निकालकर बैठे, हालचाल पूछे या कुछ वक्त उनके साथ बिता सके। बहुएं भी कोई कम नहीं हैं। उनके कदम तो बेटों से भी आगे हैं, क्योंकि वे तो कभी आदर और स्नेह के साथ बूढ़ी अम्मा से पेश नहीं आतीं। खाना तो हमेशा बिना किचकिचाए नहीं मिलता, और ऐसा अक्सर होता कि अम्मा को खाना खत्म करने के बाद भी एक शब्द तक नहीं कहा जाता।
खैर, जब बेटे ही ऐसे निकले, तो बहुएं तो पराई घर से आई हुई थीं, उनका क्या दोष! अम्मा के मन में यही विचार आते रहते थे। यही सब सोचते हुए वह घर के किसी एक कमरे में चुपचाप बैठी रहती। कभी-कभी उसकी आँखों से जल बहने लगता। "बेचारी बूढ़ी अम्मा," वह खुद को ही समझाती, "क्या कर सकती है अब?"
आजकल उसकी सोच और भी गहरी हो जाती थी। वह सोचती, "अगर मेरे पति जिंदा होते तो क्या मेरी ऐसी दशा होती?" वह मानती थी कि कभी नहीं। अगर वह साथ होते, तो शायद बूढ़ी अम्मा की ऐसी हालत नहीं होती। वे उसे साथ लेकर कहीं दूर चले जाते, जहाँ वह अपने बचे-खुचे दिन प्यार और सम्मान से जीती। पर अब वह कुछ भी नहीं कर सकती थी।
हालांकि, कभी-कभी मैं बूढ़ी अम्मा से मिलने चला जाता। मैं उसे देखता, और वह अपना दुखड़ा सुनाती। शायद, मुझे देखकर उसका मन हल्का हो जाता था। मैं भी कभी-कभी भुजिया या पकौड़े ले जाकर अम्मा को देता। वह बड़े प्रेम से खाती, और मुझे ढेर सारी आशीषें देती।
एक दिन, मैं छुट्टी पर था। सोचा, आज बूढ़ी अम्मा से मिल आऊं। जैसे ही मैं उनके घर पहुँचा, उन्होंने मुझे देखा और तुरंत प्रसन्न होकर बोली, "आओ गोविंद, बैठो बेटा।" मैं भी वहीं आंगन में बैठ गया। फिर बूढ़ी अम्मा अपनी पैबंद लगी साड़ी को दिखाते हुए बोली, "देखो बेटा, उनके गुजरने के बाद मेरी हालत किस कदर हो गई है। इस उम्र में पैबंद लगी साड़ी पहने हुए हूं। कोई ठीक से बातें भी नहीं करता है। आखिर मैं किधर जाऊं?"
बूढ़ी अम्मा की बातों ने मेरा दिल छू लिया। मेरी आँखें भी भर आईं, लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूं। वह कह रही थी, "किधर जाऊं?" यह सवाल उसकी अकेली जिंदगी के दर्द को बयान कर रहा था। उसे शायद किसी से कोई उम्मीद नहीं रही थी, लेकिन फिर भी उसका दिल किसी उम्मीद के दामन को थामे हुआ था।
मैं भी चुपचाप बैठा था, और उसके दुःख को महसूस कर रहा था। फिर मैंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, "अब इस उम्र में किधर जाओगी अम्मा! जो भी मिलता है, चुपचाप खा लो।"
मुझे पता था कि मेरी यह बात शायद अम्मा का दिल हल्का नहीं कर पाएगी, लेकिन मैं इतना जानता था कि जो भी कुछ कर सकता हूं, वह कम से कम अपना छोटा सा साथ और समर्थन दे सकता हूं।
कहानी का संदेश:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि बड़ों का आदर और उनका ख्याल रखना हमारी जिम्मेदारी है। किसी भी रिश्ते का असली मूल्य तब समझ में आता है जब हमें यह एहसास होता है कि हमारे अपनों को हमारे प्यार और देखभाल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। बूढ़ी अम्मा का अकेलापन और उनकी तकलीफ यह साफ तौर पर बताती है कि हम अक्सर अपने परिवार के बुजुर्गों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो हमारे लिए एक वक्त में सब कुछ होते हैं।
इस कहानी में सबसे बड़ी सिख है कि हमे अपने बुजुर्गों का सम्मान और देखभाल करनी चाहिए, क्योंकि उनके पास हमें देने के लिए केवल अनुभव और आशीर्वाद होते हैं। हम यदि उन्हें समय और प्यार दें, तो उनकी जिंदगी के शेष दिन भी सम्मान और खुशी से भर जाएंगे।
Moral of the Story:
"अपनों का सम्मान और देखभाल करना ही सबसे बड़ा धर्म है। हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि हमारे बुजुर्गों के पास बहुत कुछ है, और उनका अनुभव और आशीर्वाद हमारे लिए अमूल्य होते हैं।"

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