"पीढ़ियों की अद्भुत यात्रा: एक पिता का अनुभव"
लेखक: लकी ठाकुर
हाल ही में मैं अपने बेटे के पास देहरादून गया। एयरपोर्ट से जैसे ही मैं बाहर निकला, मैंने बेटे को फोन किया, “आ गया हूं, कहां हो?” बेटा आकाश ऑफिस में था और उसने मुझे बताया, “पापा, मैंने आपके लिए कैब बुक किया है, वह एयरपोर्ट के बाहर खड़ी होगी। आप वहां जाकर बैठ जाइए, घर का पता कैब ड्राइवर को दे दिया है, वह आपको घर तक छोड़ देगा।”
मैं टैक्सी में बैठकर बेटे के घर पहुंचा। घर का ताला खोलकर अंदर गया और ड्राइंगरूम में सोफे पर आराम से लेट गया। कुछ ही देर में दरवाजे की बेल बजी। दरवाजे पर एक डिलीवरी बॉय खड़ा था, उसके हाथों में कुछ खाने का पैकेट था। मैंने पैकेट लिया ही था कि बेटे का फोन आया। उसने कहा, “पापा, आपका लंच भेज दिया है, आप आराम से खा लीजिए, और फिर आराम कीजिए, शाम को मिलते हैं।”
खाना खाकर मैं सो गया। बहुत थक चुका था, क्योंकि सुबह चार बजे की फ्लाइट पकड़ने के लिए रात दो बजे से ही बरेली से उठ चुका था। गहरी नींद में चला गया था। कुछ देर बाद बेटे की आवाज आई, "पापा! कैसे हो आप?" आकाश बहुत खुश था, क्योंकि यह पहली बार था जब पापा देहरादून आए थे।
अगली सुबह जब मैं उठा, तो मुझे चाय की तलब हुई, क्योंकि आदत थी मुझे सुबह-सुबह उठकर चाय पीने की। मैंने बेटे से पूछा, "क्या किचन में दूध और चाय पत्तियां हैं? मैं चाय बना लूंगा।" हंसते हुए आकाश ने कहा, “पापा, मैं चाय कहां पीता हूं?” वह सोफे पर मोबाइल पर कुछ देख रहा था, उसकी उंगली तेजी से स्क्रीन पर घूम रही थी। मैं चुपचाप बैठ गया, सोच रहा था कि अब क्या करूंगा, यहां का तो मुझे कोई आइडिया नहीं था। बाहर जाकर चाय पीने का तो मन था, मगर कहां?
इतने में ही दरवाजे की घंटी बजी। आकाश ने कहा, “पापा, देखो कौन है।” वह थोडा नींद में था, क्योंकि जल्दी उठने के कारण वह थका हुआ था। दरवाजे पर डिलीवरी बॉय गर्मा-गर्म चाय के साथ इडली, सांभर और वडा का पैकेट लेकर खड़ा था। फिर हम दोनों ने नाश्ता किया। आकाश बोला, "पापा, आपको कोई भी चीज़ चाहिए, बस मोबाइल से ऑर्डर कर लीजिए। मैंने सोचा, आपको चाय की आदत है, इसलिए मंगा दिया।"
अपने बेटे की तकनीकी सुविधा ने मुझे हमारी पुरानी पीढ़ी की याद दिलाई। जब पापा ऑफिस से लौटते थे, तो हम सभी भाई-बहन दौड़कर उनके लिए पानी लाते थे, कोई नाश्ता देता था, तो कोई जूठे बर्तन उठाता था। हम जितना कर सकते थे, अपने पापा के लिए उतना ही करते थे।
लेकिन अब समय बदल चुका है। आज की पीढ़ी तकनीकी रूप से अधिक सशक्त है। मुझे महसूस हुआ कि हमारे समय में आदर और डर दोनों साथ चलते थे। पापा के लिए मन में एक विशेष आदर था, पर साथ ही कहीं न कहीं डर भी था कि कहीं पापा नाराज न हो जाएं। आज की पीढ़ी बहुत प्रैक्टिकल हो गई है। वे तकनीकी दुनिया से परिचित हैं और उसे जी रहे हैं।
आज जब मैं बेटे के पास था, तो मुझे यह भी याद आया कि मेरा टिकट भी उसने मोबाइल से ही बुक किया था। बेटे का ख्याल रखना मुझे बहुत स्वाभाविक लगा। ऐसा नहीं था कि हमारे बच्चे हमें सम्मान नहीं करते, वे हमसे बहुत प्यार करते हैं, बस तरीका बदल गया है। अब हम पूरी तरह से उन लोगों पर निर्भर हैं जिनसे हम कभी खुद को पालन करने के लिए प्रेरित होते थे।
उनका तरीका आधुनिक हो गया है, और हमारा तरीका पुराने समय के आधार पर चलता है। जिस तरह से बेटा अपने काम में व्यस्त रहता है, वहीं हमारे लिए यह बदलाव सहज है। मोबाइल, इंटरनेट, और अन्य तकनीकी साधनों ने हमारी जिंदगी को बहुत आसान बना दिया है, लेकिन क्या हमने इस परिवर्तन को सही तरीके से अपनाया? या फिर हम पुराने आदतों में ही उलझे रह गए हैं?
आज का समाज तेजी से बदल रहा है, और इन बदलावों के साथ हमें अपनी सोच और समझ को भी बदलने की जरूरत है। हालांकि ये बदलाव एक ओर जहां जीवन को सुविधाजनक बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमें उन पुराने रिश्तों और आदतों की भी याद दिलाते हैं जो हमारे समय में बहुत अहम थीं।
मुझे अपने बेटे के द्वारा की गई छोटी-छोटी बातों से यह महसूस हुआ कि हर पीढ़ी का अपना तरीका होता है, अपनी विशेषताएं होती हैं, लेकिन क्या इस बदलाव में हम किसी का साथ देना भूल तो नहीं रहे? क्या हम उन रिश्तों और जज्बातों को भुला रहे हैं जो एक समय हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा थे?
अंत में, यह बात स्पष्ट है कि प्यार और सम्मान में कभी कोई कमी नहीं होती, बस उसे प्रकट करने का तरीका बदल जाता है। आज की पीढ़ी ने इसे अपनी तरह से प्रकट किया है, और हमें इसे समझने की आवश्यकता है।

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