"माँ की यादें और बेतहाशा उम्मीदें"
Written by Lucky Thakur
Category: Moral Stories in Hindi
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हमारे घर के पास एक दवा की दुकान है, जिसे मेरे भाई ने बहुत मेहनत से खोला था। उस दिन दुकान पर काफी भीड़ थी। ग्राहक एक के बाद एक आते जा रहे थे और भाई दवाइयां दे रहा था। दुकान से थोड़ी दूर पर एक पेड़ के नीचे एक बुजुर्ग महिला खड़ी थी। उसकी उम्र करीब सत्तर-पचहत्तर साल रही होगी, और उसकी आंखें मेरी दुकान की तरफ ही लगी हुई थीं। मुझे दो-तीन बार लगा कि वह वहीं खड़ी होकर कुछ देख रही है, लेकिन मैं पूरी तरह से अपने काम में खोया हुआ था।
दूसरी तरफ, मेरे भाई का काम बढ़ता जा रहा था, और लोग लगातार दवाइयों के लिए पूछ रहे थे। अचानक, दुकान में कुछ भीड़ कम हुई और मुझे लगा कि अब शायद उस महिला से पूछने का सही समय हो। मैं दुकान से बाहर निकला और भाई को काउंटर पर रहने के लिए कहा। फिर हम दोनों उस महिला के पास गए।
मैंने धीरे से पूछा, "क्या हुआ, माता जी? आपको कुछ चाहिए क्या? काफी देर से आपको यहाँ खड़ा देख रही हूं, सर्दी भी बहुत है, इसलिए सोचा आपसे पूछ लूँ कि आपको क्या चाहिए?"
महिला थोड़ी झिझकते हुए बोली, "बेटा, काफी दिन हो गए। मेरे दो बेटे हैं, दोनों दूसरे शहरों में रहते हैं। हर बार सर्दियों में छुट्टियों के दौरान दोनों आते थे, लेकिन इस बार उन्होंने पहाड़ों पर छुट्टियां मनाने का फैसला किया है। कल ही मुझे यह बात पता चली। कल रात भर मुझे नींद नहीं आई, सोचा था आज तुम्हारी दुकान से दवा लूंगी, लेकिन जब देखा दुकान पर भीड़ है तो मैं यहीं खड़ी हो गई। सोचा, जब कोई नहीं होगा तो तुमसे पूछ लूंगी।"
मैंने उसकी बातों को ध्यान से सुना, फिर भाई ने पास आकर कहा, "क्या चाहिए आपको, मां जी? कोई दवाई बताइए, अभी लाकर दे देता हूं।"
महिला थोड़ी देर चुप रही, फिर हिम्मत जुटाकर उसने एक सवाल पूछा, "बेटा, क्या बच्चों को भूलने की दवाई है? अगर है तो मुझे दे दो, भगवान तुम्हारा भला करेगा।"
मैं और भाई दोनों इस सवाल पर चौंक गए। ऐसा सवाल, जो हम कभी सोच भी नहीं सकते थे, वो इस बुजुर्ग महिला ने बिना हिचकिचाए पूछ लिया। हम चुप हो गए, मानो शब्दों की कमी हो गई हो। हम दोनों उसकी आँखों में झांकने से भी डर रहे थे। एक माँ, जिसे अपनी संतान की यादों से अधिक कोई और चीज़ चाहिए थी, और वह भी भूलने की दवाई। हम दोनों उस महिला से बिना कुछ कहे चुपचाप दुकान की तरफ लौट आए।
हमारी दुकान भरी हुई थी, लेकिन उस मां के लिए हमारी पूरी दुकान भी खाली थी। हम दोनों उस पेड़ के नीचे खड़ी उस महिला से आंखें नहीं मिला पाए। उसकी वह यादें और उसकी उम्मीदें जो हमसे कहीं अधिक थीं, वह शायद किसी मेडिकल स्टोर पर न मिल सकें।
भाई और मैं काउंटर के पीछे खड़े थे, लेकिन हमारे मन में कई विचार घूम रहे थे। उस मां के लिए जो दवा थी, वह दवाई हमारे पास नहीं थी, और शायद कभी नहीं होगी। जीवन में किसी के पास अपार धन, सुख और ऐश्वर्य हो सकता है, लेकिन एक माँ की सूनी आँखें और उसकी उम्मीदें कहीं ज्यादा बड़ी होती हैं।
मैं और भाई दोनों उस दिन बहुत कुछ समझ पाए। कभी-कभी हमें उन चीजों का अहसास होता है, जो हम मानते हैं कि हमारी दुनिया में नहीं हो सकतीं। उस बुजुर्ग महिला की दवाई उसके बेटों के पास थी, और उसकी खाली बाहों में हम दोनों कुछ भी नहीं दे सकते थे। हमें यह समझने में समय लग गया कि दुनिया की सबसे कीमती दवाइयाँ सिर्फ दिलों में ही मिलती हैं, जो कभी कभी खो जाती हैं।
उस दिन के बाद, मैं अक्सर सोचता हूं कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह सिर्फ हमारे पास नहीं होता, बल्कि हमारे आस-पास के लोगों की जरूरत भी हो सकती है। हमें कभी किसी की उम्मीदों को हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि उम्मीदें ही हमें जीने का हौसला देती हैं।
कहानी का संदेश:
इस कहानी का संदेश है कि रिश्तों में सबसे ज्यादा जरुरी चीज़ है समझ और सहानुभूति। एक माँ अपने बच्चों की यादों और उम्मीदों से भरी होती है, और जब ये यादें कमज़ोर हो जाती हैं, तो किसी भी दवाई से ज्यादा उसका दिल बिखर जाता है। हमें चाहिए कि हम अपने रिश्तों को समझे और कभी किसी की उम्मीदों को निराश न करें।
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नोट: रिश्तों में सच्चाई और भावनाओं का आदान-प्रदान सबसे महत्वपूर्ण होता है। कभी भी किसी के दिल की बात को हल्के में न लें, क्योंकि यह बहुत कुछ बदल सकता है।
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