"सुमेधा का निर्णय: एक नई राह की ओर"
"पापा, पापा, आप क्या बोल रहे हो, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है," मासूमियत से बोली बच्ची, तो तीनों हंस पड़े।
सुबोध को यह समझ में आ गया कि बुजुर्ग महिला, जो चार दिन पहले इलाज के लिए आई थीं, सुमेधा की मां हैं, और सुमेधा भी यह जान गई कि वह डॉ. सुबोध, जिनके बारे में उसकी मां अक्सर बातें करती थीं, वही सुबोध हैं।
सुमेधा की मां ने तुरंत सुबोध को घर आने का निमंत्रण दे दिया। परिचय की कड़ियाँ कुछ इस तरह जुड़ीं कि सारी दीवारें जैसे खत्म होने लगीं। सुबोध की बेटी कनु, सुमेधा को बहुत पसंद करने लगी थी। कनु, जो अपनी मां से वंचित थी, सुमेधा का प्यार कुछ ज्यादा ही उमड़ता था। एक दिन, कनु के कहने पर सुमेधा सुबोध के घर गई। वहाँ नंदिनी की तस्वीर पर फूलों की माला देख सुमेधा का चेहरा फक पड़ गया। आंखों में आंसू आ गए।
"क्या नंदिनी ही...?"
"हां," सुबोध ने जवाब दिया।
सुमेधा सोफे पर बैठ गई। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। थोड़ी देर बाद सुबोध ने दो कप कॉफी बनाई। सुमेधा, कॉफी का प्याला थामते हुए असहज महसूस कर रही थी। कनु पड़ोस में खेलने चली गई थी।
कॉफी पीते हुए सुबोध ने बताया, "एम.बी.बी.एस. करने के बाद दिल्ली में ही मैंने प्रैक्टिस शुरू की थी। नंदिनी के मौसाजी हमारे विभाग के प्रमुख थे, और उन्हीं की पहल पर हमारी शादी हुई। मेरे ख्वाबों में तो कोई और थी, लेकिन मां की जिद के आगे मैं नहीं टिक सका। नंदिनी बहुत प्यारी लड़की थी, लेकिन हम दोनों के स्वभाव बिलकुल अलग थे। हमारी बातें नहीं मिल पाई। वह चाहती थी कि मैं उसे समय दूं, शॉपिंग पर जाऊं, पार्टियों में जाऊं, लेकिन मैं कभी उसे वो समय नहीं दे पाया। हमारे बीच समझ नहीं बन पाई। हमने सोचा था कि बच्चा आने के बाद सब ठीक हो जाएगा, लेकिन डिलीवरी के दौरान कोई कॉम्प्लिकेशन हो गया। लाख कोशिशों के बाद भी हम नंदिनी को नहीं बचा पाए। तब से मैं ही कनु के लिए दोनों रोल निभा रहा हूं।"
कहते हुए सुबोध का गला रुंध गया।
सुमेधा कुछ शब्दों में सांत्वना नहीं दे पाई। वह लंबे समय तक चुप बैठी रही।
"मैं तो सोच भी नहीं सकती कि नंदिनी अब इस दुनिया में नहीं है, और इस मासूम कनु का क्या कुसूर है, जो उसे बिन मां के रहना पड़ रहा है," सुमेधा की आवाज कांप रही थी।
वह उठने को हुई, तभी सुबोध ने चौंका दिया, "तुम चाहो तो कनु को मां मिल सकती है।"
"मैं समझी नहीं?" सुमेधा चौंक कर बोली।
"कई दिनों से मैं यह सवाल तुमसे पूछना चाहता था, सुमेधा... क्या तुम मेरी कनु की मम्मी बनोगी?"
"सुबोध, क्या कह रहे हो तुम? कुछ होश है तुम्हें?"
"मैं होश में हूं, लेकिन निर्णय तुम्हें ही लेना है," सुबोध ने मुस्कुराते हुए अधिकार भाव से कहा।
सुबोध का यह अधिकारभावी स्वर सुमेधा को कुछ अप्रत्याशित लगा। यह सवाल उसके दिल में हलचल मचा गया। वह फिर से सोफे पर बैठ गई।
"मुझे सोचने के लिए वक्त चाहिए। अभी मैं कुछ नहीं कह सकती," न चाहते हुए भी सुमेधा के स्वर में हलकी सी कड़वाहट घुल गई।
"ठीक है, फैसला तो तुम्हें ही करना है," सुबोध ने कोमलता से कहा।
घर लौटने पर सुमेधा ने देखा कि मां अपने काम में व्यस्त थीं। वह मन ही मन बोली, अच्छा हुआ, नहीं तो तरह-तरह के सवालों से मुझे हैरान कर देतीं। पता नहीं कैसे मेरे मन की थाह मिल जाती है मां को।
सुमेधा कुरसी पर बैठी थी, सामने टेबल पर अगले दिन के लेक्चर की किताब रखी थी, लेकिन दिल कहीं और था। उसे एक-एक पंक्ति पढ़ना भारी लग रहा था।
‘मेरी कनु की मम्मी बनोगी तुम?’ इस सवाल का मतलब क्या था? क्या मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं? क्या सुबोध को सहचर की आवश्यकता नहीं है, या फिर सिर्फ कनु के लिए मां की प्राप्ति से उसकी सारी जरूरतें पूरी हो जाएंगी? क्या अगर मैं कनु की मां बन सकती हूं तो सुबोध के जीवन में मेरा स्थान क्या होगा? लगता है, सुबोध नंदिनी को अभी भी भुला नहीं पाया है, और उसके मन में कनु को बिन मां के देखकर अपराधभाव भी है। तभी तो उसने मुझसे विवाह का प्रस्ताव नहीं, बल्कि कनु की मां बनने का सवाल पूछा। और अगर मैं शादी के लिए हां कह देती हूं, तो क्या सुबोध यह शर्त मानेगा कि मेरी मां शादी के बाद मेरे साथ रहेगी?
इन सवालों ने सुमेधा के दिमाग को मथ दिया। दूसरे दिन, अनमने भाव से वह कॉलेज पहुंची। क्लास में उसका उत्साह और उमंग गायब था। थोड़ी देर में सिरदर्द का बहाना बना कर उसने लड़कियों को फ्री कर दिया। कुछ ही पलों में सारी लड़कियां चहकती हुई चली गईं।
"भई, आज हमारी संयोगिता कहां खोई है?" अनीता की जोशीली आवाज ने सुमेधा का ध्यान तोड़ा। अनीता उम्र में सुमेधा से कुछ बड़ी थी, और सीनियर भी थी, लेकिन सुमेधा को वह दोस्ताना व्यवहार के कारण हमउम्र ही लगती थी।

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