खुशी का स्कूल और परिवार की अहमियत - एक दिलचस्प कहानी
लेखक: Lucky Thakur
नंदिनी अच्छा हुआ कि तुम आ गईं। तुम बिल्कुल सही वक्त पर आई हो,’’ नंदिनी को देखते ही तरंग की खुशी छलक पड़ी। तरंग की बांछें खिल उठी थीं, जैसे किसी पुराने दोस्त से मिलने का पल आ गया हो।
‘‘हम तो हमेशा सही वक्त पर ही आते हैं जीजाजी। पर यह तो बताइए कि अचानक ऐसा क्या काम आन पड़ा?’’ नंदिनी ने थोड़ा चिढ़ते हुए जवाब दिया, फिर भी अपनी मुस्कान को छिपाने की कोशिश नहीं की।
‘‘कल खुशी के स्कूल में बच्चों के माता-पिता को आमंत्रित किया गया है। मुझे तो जाना नहीं होगा। कल मुख्यालय से पूरी टीम आ रही है निरीक्षण करने। मेरी बहन नम्रता को तुम जानती ही हो, 2-4 लोगों को देख कर उसे घबराहट हो जाती है। अगर तुम खुशी के स्कूल चली जाओ, तो तुम पर बहुत एहसान रहेगा,’’ तरंग ने नाटकीय अंदाज में कहा, जैसे वह कोई बड़ी डिमांड कर रहा हो।
‘‘आपकी इच्छा हमारे लिए आदेश है,’’ नंदिनी ने बिना देर किए कहा, फिर हल्का सा रुककर जोड़ते हुए बोली, ‘‘पर बदले में आपको मेरी एक बात माननी पड़ेगी।’’
‘‘क्या बात है?’’ तरंग ने उत्सुकता से पूछा।
‘‘कल टिवोली में एक नई फिल्म लगी है। आप को मेरा साथ देना ही पड़ेगा,’’ नंदिनी ने अपनी शर्त रखी।
‘‘यह कौन सी बड़ी बात है! मैं तो खुद यह फिल्म देखना चाहता था और अगर तुम्हारा साथ मिल जाए तो फिर क्या कहना,’’ तरंग ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, जैसे उसकी मंशा पहले से ही यही हो।
‘‘तो खुशी की समस्या तो हल हो गई,’’ तरंग ने खुशी की तरफ देखा। ‘‘क्या तुम खुश हो, बिटिया?’’
खुशी का चेहरा तुरंत ही ग़मज़दा हो गया। ‘‘नहीं, मैं खुश नहीं हूं। मैं बहुत दुखी हूं। सभी के मम्मी-पापा जब स्कूल आएंगे, तो मैं अपनी नंदिनी मौसी के साथ वहां क्यों जाऊं?’’ खुशी ने नाखुशी जताई, और उसकी आँखों में आंसू झिलमिलाने लगे।
नंदिनी ने उसे गोदी में उठाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘चिंता मत करो, खुशी। मैं तुम्हारे स्कूल में ऐसा माहौल बना दूंगी कि तुम्हारे सारे गिलेशिकवे दूर हो जाएंगे।’’
लेकिन खुशी को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ा। ‘‘मुझे आपका समां नहीं चाहिए,’’ उसने पैर पटकते हुए कहा, ‘‘अगर मेरे मम्मी-पापा मेरे साथ नहीं जा सकते, तो मैं स्कूल ही नहीं जाऊंगी।’’ वह अपनी कमरे में चली गई, गुस्से में और उदास।
तरंग ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘तुम ने बहुत सिर चढ़ा लिया है अपनी लाडली को। घर आए मेहमान से कैसे व्यवहार करना चाहिए, यह तक नहीं सिखाया उसे।’’
नम्रता जो अब तक चुप थीं, अब खुद को रोक नहीं पाई और बोली, ‘‘उस पर क्यों बरसते हो? तुम भी तो उसके पापा हो, तुम ने कुछ क्यों नहीं सिखाया?’’
तरंग ने गुस्से में आकर कहा, ‘‘मैं उसे ऐसा सबक सिखाऊंगा कि वह जीवन भर याद रखेगी।’’ इसके बाद वह तेज़ कदमों से अंदर की ओर लपका।
नम्रता ने घबराई हुई खुशी को गोदी में लिया और कहा, ‘‘देखो, बेटा। तुम्हारे जीजाजी का गुस्सा ठीक नहीं है, लेकिन हमें भी परिवार के बीच तालमेल बनाए रखना चाहिए।’’
तरंग की मां पूर्णा देवी जो अब तक चुप थीं, उन्हें यह सब देखकर परेशान हो गईं और वह भी बोल पड़ीं, ‘‘तुम इतने गुस्से में क्यों हो, बेटा? बच्चों के साथ इतना कठोर व्यवहार नहीं करना चाहिए। उन्हें प्यार और समझ से ही ठीक किया जा सकता है।’’
तरंग कुछ समय के लिए चुप रहा, फिर धीरे से बोला, ‘‘हां, शायद तुम सही कह रही हो। मुझे अपनी बेटी को थोड़ा समझाना होगा।’’
अगले दिन, खुशी स्कूल गई, लेकिन उसका मन उचाट था। नंदिनी ने अपना वादा निभाया और खुशी के स्कूल पहुंची। स्कूल में सभी बच्चों के माता-पिता आए थे और खुशी भी उनके बीच कुछ हद तक घबराई हुई थी। नंदिनी ने उसे सहज बनाने के लिए अपनी पूरी कोशिश की। धीरे-धीरे, खुशी को यह समझ में आया कि हर परिवार का एक तरीका होता है और उसकी मौसी ने उसे किसी न किसी तरीके से सहारा दिया।
आखिरकार, खुशी भी थोड़ा मुस्कुराई और नंदिनी के साथ समय बिताते हुए उसकी उदासी दूर हो गई। उस दिन खुशी ने अपने माता-पिता से यह सिखा कि एक परिवार के सदस्य का प्यार और साथ सबसे ज्यादा मायने रखता है।
जब खुशी घर वापस आई, तो वह एक अलग ही आत्मविश्वास के साथ आई थी। तरंग ने उसे देखा और अपनी नादानी पर पछताया। ‘‘तुम ठीक कह रही थीं, मां,’’ तरंग ने पूर्णा देवी से कहा, ‘‘अब मुझे अपनी बेटी के साथ ज्यादा समझदारी से पेश आना होगा।’’
नंदिनी ने भी मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘देखो, अब सब कुछ सही है। कभी-कभी बच्चों को समझाने के लिए थोड़ी सी भावनाओं की ज़रूरत होती है, और जब वो समझ जाते हैं, तो उनके अंदर आत्मविश्वास भी आता है।’’
मोरल: कभी-कभी हमें अपने परिवार के छोटे-छोटे मामलों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। प्यार और समझ से हर मुश्किल हल हो सकती है। बच्चों को सिखाना और उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन देना बहुत जरूरी है।

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