"रेखा की साहसिक यात्रा: एक साधारण जीवन की असाधारण कहानी"
लेखक: Lucky Thakur
रेखा ने बैग को अपने कंधे पर लटकाते हुए मैनेजर, मिस्टर जगतियानी से कहा, “मुझे ही बैग ढोने की क्या जरूरत है? रामलाल भी तो...” लेकिन मिस्टर जगतियानी घबराकर बोले, “नहीं, नहीं, बैग तो तुम्हीं रखो। बैंक कितनी दूर है।” फिर उन्होंने पास खड़े रामलाल को पुकारा, “चलो भई, रामलाल, जल्दी करो।”
रामलाल, जो उस वक्त एक बिगड़ी पड़ी बस के पास तंबाकू का आनंद ले रहा था, लपकते हुए आया और बोला, “आ गया, मालिक।”
रेखा, रोज की तरह, रामलाल के पीछे-पीछे चल पड़ी। उसे यह भारी बैग रोज ढोने में तसल्ली नहीं थी, लेकिन मिस्टर जगतियानी पर उसे भरोसा था, और यही कारण था कि वह रामलाल को साथ ले जाती थी। रामलाल बड़ा हट्टा-कट्टा और मजबूत आदमी था, लेकिन अक्ल से थोड़ा कोरा था। हालांकि, वह अपने मालिक के लिए किसी भी चीज़ से नहीं डरता था। वह रामलाल का साथ हमेशा किसी न किसी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करता था।
दि रोज ट्रांसपोर्ट कंपनी के पास 20 से ज्यादा बसें थीं। अकसर इनमें से कुछ खराब हो जातीं, लेकिन सामान्यतः ये दिनभर चलती रहतीं और कंपनी को करीब 20-25 हजार रुपए प्रतिदिन की आय हो जाती थी। त्योहारों के समय में तो यह रकम बढ़कर 40 हजार तक पहुँच जाती थी। मिस्टर जगतियानी एक डरपोक आदमी थे, और रात को वह हमेशा रकम बैंक में जमा करने जाते थे, ताकि वह किसी प्रकार की समस्या से बच सकें। चौक वाले भारतीय स्टेट बैंक की शाखा रात के 9 बजे तक खुली रहती थी, और रेखा रोज़ 8:50 बजे तक वहां पहुंच जाती थी।
बैंक तक का रास्ता धीरे-धीरे सुनसान हो जाता था, और रास्ते में कहीं-कहीं पान की दुकानें और चाय के स्टाल थे। फिर भी रेखा को रास्ते में डर लगता था। वह सोचती थी कि कहीं कोई व्यक्ति बैग छीन न ले या उसे नुकसान न पहुंचाए, लेकिन अब रामलाल के साथ होने के कारण उसे थोड़ा आराम था।
चलते-चलते रेखा ने बैग को दूसरे कंधे पर रखते हुए कहा, “रामलाल, अगर कोई गुंडा छुरा या पिस्तौल लेकर...”
रामलाल हंसा और मुस्कुराते हुए बोला, “बिटिया, हम एक हाथ में पिस्तौल और छुरा सब झाड़ देंगे। तुम चिंता मत करो। यहां हमको सब लोग जानते हैं, और अगर किसी ने कुछ किया, तो मैं उठाकर पटक दूंगा। हड्डी-पसली सब बराबर हो जाएगी।”
रेखा मुस्कुराती हुई उसे देखती रही। लेकिन, मन के भीतर वह जानती थी कि यह कोई गांव का अखाड़ा नहीं था, जहां कोई सीधा मुकाबला हो। शहर में कहीं से भी कोई आकर छुरा घोंप सकता था या गोली चला सकता था। फिर भी, रामलाल के शब्दों ने उसे थोड़ी राहत दी थी।
बैंक में पहुंचते ही कैशियर ने उनका इंतजार किया। रेखा ने बैग से नोटों की गड्डियां निकालीं और कैशियर ने उन्हें फुर्ती से गिन लिया। “21,900 रुपये,” कैशियर ने कहा और मुहर लगा कर रसीद रेखा को थमा दी।
बैंक से लौटते वक्त, रेखा रोज की तरह चाय खाने के लिए चायखाने में रुकी। रामलाल चाय पीते हुए बोला, “बिटिया, तुम चिंता मत करो। रामलाल के रहते कोई पंछी भी पंख नहीं फड़फड़ाएगा। हम यहां सबको जानते हैं। किसी ने कुछ किया, तो मैं उठाकर पटक दूंगा।”
रेखा उसे देखती रही, लेकिन उसके मन में एक डर था। वह सोचती थी कि रामलाल की सोच इतनी सरल और सीधी क्यों है। क्या वह कभी यह समझ पाएगा कि शहर में हिंसा केवल ताकत से नहीं, बल्कि चतुराई से की जाती है? हालांकि, रामलाल के दिल में बुराई नहीं थी, और वह इसे पूरी तरह से नकारात्मक रूप से नहीं देख सकती थी।
उसके लिए यह काम महज पैसे कमाने का तरीका था। उसे कंपनी से 500 रुपये का अतिरिक्त बोनस मिलता था, क्योंकि मिस्टर जगतियानी उसे एक अच्छी लड़की मानते थे और उसकी मदद करना चाहते थे। रेखा का अकाउंटिंग और फाइलिंग का काम बहुत अच्छा था, और इसके लिए वह अपने परिवार का पालन-पोषण करती थी। रेखा ने कभी भी शादी के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा था, क्योंकि वह जानती थी कि उसका परिवार पहले आना चाहिए।
30 साल की उम्र के बाद उसकी शादी होने की उम्मीद कम थी, क्योंकि न तो वह खूबसूरत थी और न ही उसका शरीर आकर्षक था। संकरे माथे, दबी हुई नाक, छोटी-छोटी आंखें, मोटे होंठ, सांवला रंग और सपाट शरीर के कारण वह लड़कियों की तुलना में कम आकर्षक लगती थी। लेकिन रेखा को खुद से कोई शिकायत नहीं थी, वह जानती थी कि परिवार की जिम्मेदारियां पहले आती हैं।
रेखा ने रसीद मिस्टर जगतियानी को दी और फिर साढ़े 9 बजे की बस से अपने घर के लिए निकल पड़ी। यह बस उसे चौराहे के पास उतार देती थी, जहां से वह अपने घर की ओर बढ़ती थी।

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