"अचानक आई दुख की खबर"
"बड़े भैया बुआ जी नहीं रहीं!" बल्लू की आवाज़ में एक खौफनाक सन्नाटा था। उसका चेहरा कांप रहा था और आंखों में आंसू थे। यह खबर जैसे आसमान से गिरी हो। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो इंसान अभी तक उनके बीच था, वह अचानक बिना किसी चेतावनी के इस दुनिया से चला गया।
"अरे कब हुआ, क्या हुआ अचानक?" आशीष ने दंग होते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में चिंता और हैरानी का मिला-जुला असर था।
"कल तक तो ठीक थीं, बड़े भैया रात में अचानक सांस लेने में परेशानी महसूस करने लगे। और देखते ही देखते... वह कुछ नहीं कर पाए..." बल्लू की आवाज़ अब धीरे-धीरे टूटने लगी थी। वह फूट-फूट कर रोने लगा।
आशीष और उसकी पत्नी रचना यह सोच नहीं पा रहे थे कि क्या हुआ, कैसे हुआ। यह खबर सुनकर उनके मन में डर और हलचल दोनों थे। क्या कोई ऐसा दिन होता है जब हम तैयार होते हैं किसी दुखद घटना के लिए? नहीं। और जब अचानक कुछ ऐसा हो जाता है, तो मन शून्य हो जाता है।
"आप लोग जल्दी आइए!" बल्लू के शब्दों ने आशीष को हकीकत का एहसास दिलाया। यह कोई बुरा सपना नहीं था, यह एक कड़वी सच्चाई थी।
"हां, हां बिल्कुल, हम तुरंत ही निकलते हैं!" आशीष ने फोन रखते हुए अपनी पत्नी रचना को पूरी घटना बताई और उसके बाद दोनों जल्दी-जल्दी अपनी तैयारी करने लगे।
गांव जाना कोई आसान काम नहीं था। मुंबई से गांव का रास्ता दूर था और डायरेक्ट फ्लाइट भी नहीं थी। आशीष और रचना को पूरी तैयारी के बाद रेलगाड़ी से यात्रा करनी पड़ी। सफर लंबा था, पर फिर भी उनका मन अशांत था। कैसे और क्यों यह सब हुआ, यह सवाल उनके दिमाग में लगातार घूम रहा था।
वह दोनों ट्रेन में चुपचाप बैठे थे। आशीष सोच रहा था कि क्या यह एक बुरा सपना था, जिसे वह जागकर भूल जाएं, लेकिन सच्चाई यही थी। बड़े भैया बुआ जी का जाना किसी के लिए भी सहन करना मुश्किल था। आशीष को याद आ रहा था कि बुआ जी के साथ बिताए गए वो खुशनुमा पल, उनकी मीठी बातें, और उनकी सिखाई हुई बातें। क्या वह अब कभी अपने प्रियजनों को देख पाएंगे?
"क्या तुम ठीक हो?" रचना ने आशीष से पूछा, उसकी आवाज़ में चिंता थी। आशीष ने सिर झुका लिया।
"तुमसे कह रहा हूं, रचना, यह सब अचानक कैसे हुआ! मैंने सोचा था कि हमें वक्त मिलेगा उनसे और बातें करेंगे, लेकिन अब तो..." आशीष का दिल भारी हो गया।
कुछ घंटों बाद, ट्रेन गांव के नजदीक पहुंची। आशीष और रचना का मन घबराया हुआ था, लेकिन उन्हें जाना ही था। गांव में उनका घर बहुत दूर था, और यहां के रास्ते भी खतरनाक थे। गाड़ी से आकर वे पैदल रास्ते से गांव की ओर बढ़े।
जैसे ही वे गांव के पास पहुंचे, उन्हें वहां का माहौल कुछ और ही लग रहा था। कोई भी बुरा वक़्त जब आता है, तो जैसे हर ओर शांति का आलम सा हो जाता है। लोग कहीं भी नहीं दिखाई दे रहे थे।
आशीष ने फोन से बल्लू को फिर से कॉल किया, "हम लोग आ गए हैं, बल्लू। जल्दी से हमें उस घर तक ले आओ।"
कुछ ही देर में बल्लू दौड़ते हुए आया और आशीष को जल्दी से घर के भीतर ले गया।
घर में दुःख का माहौल था। बुआ जी के जाने के बाद सब गहरे शोक में थे। आशीष की आंखों में आंसू थे, पर उसने उन्हें पोछने की कोशिश की और खुद को संभालते हुए अंदर गया।
"क्या हुआ था बुआ जी को?" रचना ने धीरे से पूछा। बल्लू ने सिर झुका लिया।
"बड़े भैया के साथ थे, अचानक रात में सांस लेने में परेशानी हुई। डॉक्टर को बुलाने से पहले ही वह हमें छोड़ गईं।" बल्लू की आवाज़ में दर्द था।
आशीष ने बल्लू को सहारा देते हुए कहा, "यह सब इतनी जल्दी कैसे हो गया, बल्लू? हमें विश्वास ही नहीं हो रहा।"
"कभी ऐसा लगता है कि हम सब बहुत खुश हैं, लेकिन फिर अचानक कोई हमें छोड़ जाता है। और तब हमें यह महसूस होता है कि समय के साथ हम कैसे चलते जा रहे थे, हमें समझ ही नहीं आता।" बल्लू की बातें दिल को छू गईं।
यह घटना आशीष और रचना के दिल में हमेशा के लिए रह गई। वह यह समझ गए थे कि ज़िन्दगी में हर पल का महत्त्व है। कभी किसी की खुशी तो कभी किसी का दुःख, यह सब ही हमें समय की क़ीमत सिखाते हैं। उनके लिए अब यह एक नई समझ बन चुकी थी कि हमें हर रिश्ते को पूरी तरह जीना चाहिए, क्योंकि कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता।
मोरल:
हमेशा रिश्तों में समय देना चाहिए, और जो हमारे पास है उसे खोने से पहले उसकी क़ीमत समझनी चाहिए। ज़िन्दगी का हर पल अनमोल होता है।
लेखक: Lucky Thakur

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