"प्यार की अजीब राहें"
लेखक: लकी ठाकुर
प्रदीप ने रेखा के जवाब का इंतजार किए बिना ही मोटरसाइकिल मोड़ दी और शहर के दूसरे किनारे पर बसे एक छोटे से साधारण दोमंजिला घर के सामने आकर उसे खड़ा किया। ‘‘मेरा गरीबखाना,’’ उसने मुस्कुरा कर कहा।
रेखा चुपचाप उसके साथ बरामदे में आ गई। प्रदीप ने घंटी बजाई, लेकिन कई बार बटन दबाने के बाद भी दरवाजा नहीं खुला। ‘‘पिताजी जरूर घूमने निकले हैं। 9 बजे तक लौटेंगे, लेकिन कोई बात नहीं, मेरे पास चाबी है,’’ उसने कहा और अपनी चाबी से दरवाजा खोल कर रेखा को भीतर ले आया।
साधारण सी बैठक थी – सोफा, टीवी, दीवान इत्यादि से सजा हुआ। एक तरफ भीतर जाने का दरवाजा था। प्रदीप भीतर गया और बोला, ‘‘वे जरूर बाहर होंगे। कोई बात नहीं, उनके आने तक हम बैठते हैं। तुम्हें जल्दी तो नहीं है?’’
रेखा ने धीरे से कहा, ‘‘नहीं, मुझे कोई जल्दी नहीं है।’’
‘‘तो आज मेरी बनाई चाय पियो,’’ प्रदीप हंसा, ‘‘तुम्हारे जैसी तो क्या बनेगी, किंतु…’’ वह भीतर चला गया। रेखा की आँखों के सामने रंगीन सपने तैरने लगे। क्या प्रदीप सचमुच उसे चाहता है? क्या वह उसे अपने पिता से मिलाने लाया है? अगर शादी हुई तो वह इस घर में रहेगी, क्या वह कभी अपनी जिंदगी के इस नए मोड़ पर कदम रखेगी?
कुछ ही देर में प्रदीप चाय ले आया। रेखा को वह मामूली चाय भी अमृत जैसी लगी, क्योंकि वह प्रदीप द्वारा बनाई गई थी। प्रदीप ने चाय का कप उसके हाथ में दिया और अपना हाथ उसकी हथेली में दबा कर धीरे से बोला, ‘‘रेखा, तुम मुझसे प्यार करती हो?’’
रेखा शरमा गई। उसकी आँखें जैसे सच्चाई बोल रही थीं, लेकिन शब्द उसके गले में फंसे हुए थे। प्रदीप बोला, ‘‘तुम्हारी आँखें सच बता रही हैं। हम दोनों जल्द शादी करेंगे।’’
‘‘सच?’’ रेखा ने पूछा, जैसे किसी बच्चे को मिठाई मिलने का वादा किया गया हो और वह उसे मानने में संकोच कर रहा हो।
‘‘बिल्कुल सच,’’ प्रदीप ने कहा, ‘‘मेरे घर वाले मेरी बात नहीं टालेंगे, बस तुम्हारे पिताजी की राय चाहिए होगी।’’
‘‘वह तो तुम्हें बहुत अच्छा लड़का समझते हैं। खुशी से राजी हो जाएंगे। लेकिन प्रदीप, क्या सच कहते हो या यह सब सपना है?’’ रेखा की आवाज में अब भी संदेह था, वह अभी भी यह विश्वास नहीं कर पा रही थी कि उसकी ज़िन्दगी में यह नया मोड़ सच में आएगा।
‘‘सपना?’’ प्रदीप ने उसकी ओर बढ़ते हुए कहा, ‘‘यह सपना नहीं, असली है।’’ और फिर उसने रेखा को आलिंगन में कस लिया। रेखा, जो इस समय तक अपने मन की हलचल को समझ नहीं पा रही थी, अब पूरी तरह से प्रदीप के पास समर्पित हो गई थी। उसके मन में अजीब सी बाढ़ सी आ गई थी।
रात 8 बजे तक प्रदीप ने रेखा को घर वापस पहुंचा दिया। उस समय तक प्रदीप के पिता वापस नहीं लौटे थे, इसलिए उनका सामना नहीं हो पाया। प्रदीप ने रेखा के पिता के चाय पीने का अनुरोध नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और कहा कि वह पहले ही बहुत बार चाय पी चुके थे।
रेखा रात को खाना नहीं खा पाई। उसकी आत्मा कुछ ऐसी संतुष्ट हो चुकी थी कि वह बस सोने का मन कर रही थी। रातभर रेखा के शरीर में मीठी टूटनभरी खुमारी छाई रही। पहली बार का यह पुरुष संसर्ग उसे एक अलग ही दुनिया में ले गया, जहां कुछ भी न था सिवा वसंत के। रातभर रेखा को मीठे सपने आते रहे।
सुबह जब रेखा जागी तो बदन में हल्का सा दर्द था, लेकिन साथ ही ताजगी भी महसूस हो रही थी। नहाधो कर वह कार्यालय चली गई, लेकिन पूरे दिन उसका मन घबराया हुआ था। वह सोचती रही कि क्या अब प्रदीप से कभी नहीं मिलेगी। क्या वह अब उसकी जिंदगी में नहीं होगा?
लेकिन प्रदीप उससे मिला। वह रोज की तरह रामलाल के साथ पैसे जमा कराकर साढ़े 9 बजे चौराहे पर खड़ा था। ‘‘रेखा…’’ प्रदीप ने उसे देखा और रेखा चौंक पड़ी। उसका मन खिल उठा। वह धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी, और प्रदीप ने पूछा, ‘‘कैसी हो?’’
रेखा की आँखें झुकी हुई थीं। प्रदीप फिर बोला, ‘‘आओ, मोटरसाइकिल पर बैठो।’’
‘‘घर सामने ही है,’’ रेखा बोली, लेकिन प्रदीप ने धीरे से कहा, ‘‘तुम्हारा असल घर तो वह है, जहां हम अभी चलेंगे, रेखा रानी। आओ, बैठो।’’
रेखा का दिल एक अजीब सी धड़कन के साथ बढ़ा, और वह प्रदीप के पीछे मोटरसाइकिल पर बैठ गई। प्रदीप मोटरसाइकिल चलाते हुए उसे अपने घर की ओर ले जाने लगा। रेखा का बदन बार-बार सिहर रहा था। प्रदीप उसे भीतर के कमरे की ओर ले गया। रेखा ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पिताजी?’’
प्रदीप मुस्कुराया और बोला, ‘‘आज वे शादी में गए हैं। सभी लोग 15-20 दिनों बाद लौटेंगे। हमें आज़ादी है, रेखा।’’
यह कहानी न केवल एक प्रेम कहानी है, बल्कि यह एक जटिल रिश्ते की परतों को भी सामने लाती है। प्रदीप और रेखा के बीच विश्वास और प्रेम का एक नया रूप है, लेकिन यह सब एक ऐसे मोड़ पर आकर खत्म होता है, जहां जीवन के कई पहलुओं को चुनौती दी जाती है। क्या यह प्रेम सच्चा था? क्या यह एक पल का आवेग था? इन सवालों का जवाब केवल समय दे सकता था।
मोरल: यह कहानी हमें यह सिखाती है कि प्रेम कभी भी अचानक आ सकता है, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि हमें अपने फैसलों को पूरी तरह से सोच-समझ कर लेना चाहिए। प्यार सिर्फ एक भावना नहीं है, बल्कि यह दो दिलों के बीच एक गहरा और विश्वासपूर्ण रिश्ता होता है।

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