"बड़े-बुजुर्गों की छांव में बसा सुख"
लेखक: लकी ठाकुर | Moral Stories in Hindi
अनु और सुनील का जीवन, प्यार और मामूली तकरारों का मिश्रण था। अनु एक ऐसी महिला थी, जो जिंदगी को मस्ती से जीना पसंद करती थी। वह हर दिन कुछ नया करने का सोचा करती थी, और यही कारण था कि उसकी दिनचर्या पूरी तरह से घूमने-फिरने, मस्ती करने और समय बर्बाद करने में व्यतीत होती थी। एक दिन, जब वह मूवी देखने का मूड बना रही थी, उसने अपने पति सुनील से कहा, "सुनो, आज शाम को हम पिक्चर चलते हैं, 'गुमराह' लगी है। वापसी में कहीं खा लेंगे और रोहन के लिए पैक भी करा लेंगे।"
सुनील ने थोड़ी खीझते हुए कहा, "ठीक है, लेकिन पापा के लिए कुछ बना देना। वह कब तक भूखे बैठे रहेंगे?"
"अरे, सुबह का बचा हुआ खाना है, पापा वही खा लेंगे," अनु ने शांति से जवाब दिया।
"फिर वही बात," सुनील ने थोड़ा नाराज होते हुए कहा। "पापा को चबाने में दिक्कत होती है, उनके लिए कुछ ताजा बना दो।"
"बेटे रोहन के पेपर चल रहे हैं, वह घर में ही है, वह गरम करके पापा को दे देगा। वह ठीक रहेगा," अनु ने कहा।
"सुबह का नहीं, पापा के लिए ताजे खाने की जरूरत है।" सुनील ने फिर से उसे समझाने की कोशिश की।
"तुम भी ना, हमेशा मुझे ही चूल्हे पर चढ़ाए रखते हो," अनु ने खीजते हुए कहा।
"क्या कहा तुमने?" सुनील ने गुस्से से कहा। "बुढ़ापे की स्थिति से हर इंसान गुजरता है। कल तुम और मैं भी इसी जगह पर होंगे। समझो।"
"वैसे भी किसी ने सही कहा है, 'माता-पिता को बुढ़ापा उतना कमजोर नहीं करता, जितना हमारा रवैया करता है।' याद रखो, माता-पिता उस पेड़ की तरह होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के हमें छांव देते हैं," सुनील ने उसे समझाया।
"हमें भी बुढ़ापा आएगा। रोहन को अच्छे संस्कार दो, जैसा हम बोएंगे, वैसा ही काटेंगे," सुनील ने अपना विचार व्यक्त किया।
यह सुनकर अनु थोड़ी चुप हो गई, लेकिन फिर भी मन में गुस्सा था। उसने किचन की तरफ कदम बढ़ाए, जबकि सुनील अपने कमरे में चला गया।
वहीं, अनु के पिता जी सब कुछ सुन रहे थे। उन्हें यह नहीं पसंद आया कि उनके बेटे और बहू के बीच इस तरह के झगड़े हो रहे थे। उन्होंने धीरे से कहा, "किसी को मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं है। मेरे लिए तुम दोनों आपस में क्यों लड़ रहे हो?" उनका यह सवाल पोते रोहन ने भी सुना।
रोहन को यह समझते देर न लगी कि माँ-पापा का झगड़ा उनके दादाजी के लिए सही नहीं है। वह तुरंत दादाजी के पास गया और कहा, "क्या हुआ दादाजी? आप परेशान क्यों हो?"
रोहन का यह मासूम सवाल दादाजी के चेहरे पर मुस्कान ले आया। उन्होंने कहा, "कुछ नहीं बेटा, बस तुम्हारे माँ-पापा के झगड़े की बात हो रही थी।"
रोहन ने हंसते हुए कहा, "चलिए दादाजी, लूडो खेलते हैं। मैं पढ़ते-पढ़ते बोर हो गया हूं।"
दादाजी का दिल खुश हो गया। ये वे पल थे, जब वह अपनी सारी चिंताओं को भूलकर पोते के साथ खेल में खो गए थे।
जब अनु और सुनील मूवी देखने गए, तब रोहन ने फोन उठाया और एक अच्छे होटल से दादाजी के लिए खाना मंगवाया। खुद भी खाया और दादाजी को भी खिलाया। "पोते का यह असीम प्यार देखकर दादाजी की आँखों में आंसू आ गए और उन्होंने रोहन का माथा चूमा।"
अगले दिन, अनु और सुनील अपने बेटे रोहन के भविष्य को लेकर चर्चा कर रहे थे। अनु ने मजाक करते हुए कहा, "जब तुम्हारा करियर बन जाएगा, तो हमारा बुढ़ापा भी सुधर जाएगा।"
रोहन ने जवाब दिया, "हां, दादाजी का भी तो सुधर गया!" यह सुनकर अनु को झटका लगा, लेकिन वह अपने बेटे की बातें समझने की कोशिश कर रही थी।
थोड़ी देर बाद, अनु ने पिताजी के कमरे से हंसने की आवाजें सुनीं। उसने कमरे में झांक कर देखा और सोचा, "दोनों बाबा-पोते कितने खुश हैं।" उसे समझ में आया कि बड़ों की छांव हमेशा हमारे लिए कितनी अहम होती है। एक बार जब वह नहीं रहते, तो उनकी अहमियत हमें महसूस होती है।
अनु ने सोचा, "मैं वही गलती करने जा रही थी।" लेकिन अब उसने समझ लिया कि उसे अपने माता-पिता के साथ ज्यादा वक्त बिताना चाहिए, क्योंकि उनके बिना जीवन अधूरा होता है।
सीख: इस कहानी से हम यह सीख सकते हैं कि प्यार और समझदारी से हम किसी भी रिश्ते को मजबूत बना सकते हैं। बड़ों का आशीर्वाद और उनकी छांव ही जीवन में सबसे बड़ा सुख देती है। इसलिए हमें अपने माता-पिता और दादा-दादी से अच्छे रिश्ते बनाए रखने चाहिए और उन्हें सच्चे दिल से सम्मान देना चाहिए।
प्रेरणा: हम सभी को अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए, परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाना चाहिए। बच्चों को संस्कार देना और बड़ों का सम्मान करना जीवन की सबसे बड़ी सिख है।

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