"जहां रिश्तों की अहमियत पैसे से बड़ी होती है"
कहानी लेखक: लकी ठाकुर
अरमान ने अपनी बीवी प्रिया से गुस्से में कहा, "क्या तुम मुझे खाना भी नहीं खाने दोगी? दिनभर ऑफिस की टेंशन झेलता हूं, तुम्हारे लिए दिन-रात मेहनत करता हूं, और जब घर आकर थोड़ा आराम करने का मौका मिलता है, तो तुम्हारी शिकायतें सुनता हूं। इंसान हूं यार, मशीन नहीं।"
प्रियाने एक गहरी सांस ली, फिर धीरे से बोली, "हां, हां, मैं ही सब कुछ गलत हूं। तुम तो दूध के धुले हो, अरमान। पैसा जिंदगी जीने के लिए कमाया जाता है, पैसे के लिए तो कोई नहीं जीता। हम सब यहां नहीं रहेंगे, तो इस पैसे का क्या करेंगे? क्या तुम याद करते हो कि आखिरी बार तुमने बच्चों और मेरे साथ वक्त कब बिताया था? अगर यही चलता रहा तो मैं..."
प्रियाने बात पूरी नहीं की, और अरमान ने गुस्से में कार की चाबी उठाई और बाहर निकल गया। लेकिन बाहर निकलने के बाद, उसने कार में बैठने की बजाय पैदल ही चलने का फैसला किया। उसे खुद भी नहीं पता था कि वह कहां जा रहा है, बस उसे कुछ वक्त अकेले बिताना था।
अरमान कॉलोनी के आखिरी छोर तक पैदल चला गया, जहां चौकीदार विजय और उसकी पत्नी के बीच धीमी आवाजें सुनाई दे रही थीं। अरमान ने कदम रुकते हुए सुना, "खाना नहीं खाया तुमने?"
विजय की पत्नी बोली, "आपके बिना तो कभी खाया नहीं मैंने, अब क्या करूं?"
विजय ने प्यार से कहा, "तुम ना, बहुत ज्यादा काम करती हो, थोड़ा आराम भी किया करो। बीमार हो जाओगी।"
विजय की पत्नी ने हंसते हुए कहा, "आप हो ना, आपको देखकर सब ठीक लगने लगता है।"
अरमान सोचने लगा, "शायद मेरी अमीरी और उनकी गरीबी के बीच बस यही फर्क है — सुकून।"
अरमान ने अपनी जेब से फोन निकाला और प्रिय का नंबर डायल किया। फोन की दूसरी तरफ से प्रिय ने फोन उठाया, लेकिन वह चुप थी। अरमान को लगा कि वह अपनी सिसकियों को दबाने की कोशिश कर रही है। कुछ पल बाद, प्रिय ने कांपते हुए कहा, "हां?"
अरमान की आवाज़ में पछतावा था, "आई एम सॉरी, प्रिया। मैं सच में माफी चाहता हूं। तुम ठीक कहती हो, मैं तुम्हारे लिए कमाता हूं, लेकिन तुम्हें ही भूल जाता हूं। अब ऐसा नहीं होगा। प्लीज़ मुझे माफ कर दो।"
प्रिय ने रुकते हुए कहा, "तुम पागल हो, ऐसा कोई बच्चों की तरह रोता है? अब घर आ जाओ, खाना खाते हैं।"
अरमान ने कहा, "नहीं, मैं कॉलोनी के गेट पर खड़ा हूं। तुम बच्चों को लेकर आ जाओ, हम सब बाहर खाना खाने चलेंगे। घर में जो खाना बना है, वह विजय को दे देना।"
कुछ ही देर में प्रिय रिद्धि और आरव के साथ अरमान के पास आई। सब खुश थे क्योंकि महीनों बाद वे कहीं बाहर जा रहे थे। प्रिय को हैरानी तब हुई जब अरमान उन्हें एक बड़े होटल की बजाय एक छोटे से ढाबे पर ले गया। प्रिय ने मुस्कुराते हुए कहा, "अरमान, तुम्हें कैसे याद आया? मुझे तो ढाबे का खाना बहुत पसंद है।"
सभी ने ढाबे पर खाना खाया, हंसी-मजाक की और देर रात घर लौटे। उस रात अरमान ने प्रिय को वैसे ही गले लगाया, जैसे पहले प्यार के दिनों में करता था। प्रिय की आंखों में खुशी और चेहरे पर सुकून था। अरमान को आज समझ आया कि वह कितनी बड़ी गलती कर रहा था, और इसी सोच में खोते-खोते, उसे कब नींद आ गई, उसे पता नहीं चला।
अगले दिन ऑफिस जाते वक्त, चौकीदार विजय ने गेट खोला और अरमान को गुड मॉर्निंग कहा। अरमान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, और फिर कुछ सोचकर गाड़ी बैक की।
"विजय, इधर आओ," अरमान ने गाड़ी का शीशा नीचे कर आवाज़ दी।
"जी, साहब," विजय ने झुककर जवाब दिया।
"आज तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का खाना हमारे साथ है। रात साढ़े आठ बजे तैयार रहना। मैं खुद लेने आऊंगा।"
विजय को समझ नहीं आया कि अचानक क्यों यह सब हो रहा था। अक्सर साहब लोग सिर्फ बचा-खुचा खाना दे देते थे, लेकिन किसी ने घर बुलाकर खाना खिलाने की बात कभी नहीं कही थी।
"अरे भाई, कहां खो गए? तैयार रहना। और अब कोई बहाना मत बनाना," अरमान मुस्कुराया और गाड़ी आगे बढ़ा ली।
विजय की आंखों में आंसू थे, लेकिन उसने हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। विजय को क्या पता था कि उसकी मासूम बातों ने अरमान के परिवार की खुशियां वापस ला दी थीं।
संदेश: इस कहानी से यह सिखने को मिलता है कि पैसा सिर्फ जीवन की जरूरतों को पूरा करने का साधन होता है, लेकिन सच्ची खुशी और संतुष्टि रिश्तों और प्यार में छिपी होती है। आजकल के भौतिकवादी युग में हम अक्सर अपने करीबी रिश्तों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन अगर हम अपनी प्राथमिकताओं को ठीक से समझ लें और थोड़ा समय अपने परिवार के लिए निकालें, तो जीवन में संतुलन और सुकून पाया जा सकता है।
प्रेरणा: "जहां रिश्ते सच्चे होते हैं, वहां कोई भी समस्या बड़ी नहीं होती।"

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