"ध्वस्त अरमानों की छांव"
लेखक: लकी ठाकुर
उस दिन बंद कमरे में हो रही उनकी बातें अधखुली खिड़की से सुनीं, तो मैं दंग रह गया। अंदर से खाली होता जा रहा था, अज्ञात भय सालने लगा। बेटे अखिलेश की शादी हुए अभी दो ही साल तो बीते हैं। काफी सोच-विचार कर भरे घर की बेटी को बहू बनाकर लाया था। सोचा था, अब थोड़ी राहत मिलेगी। सेवानिवृत्ति के पहले तो काम के बोझ से दबे रहना पड़ता था।
पोता हुआ, तो चहल-पहल बढ़ेगी, उसकी मनचाही मुराद पूरी करने का आनंद अलग ही होगा। लोग, बहू-बेटे की सेवाओं की पास-पड़ोस में ही नहीं, बल्कि गाँव में भी चर्चा होगी। पोते का सुख तो मूल से भी प्यारा होता है न? घर-आँगन की रौनक बढ़ेगी, उसकी किलकारियों से मन मयूर नाच उठेगा। उसे अच्छे संस्कार, उत्तम शिक्षा देकर निहाल हो जाऊँगा। ये सारे अरमान एक ही पल में ध्वस्त हो गए।
बहू सुरेखा अपने पति अखिलेश से कह रही थी, "अब तो इस बूढ़े से पिंड छुड़ाकर कहीं बाहर की जिंदगी जीने की चाह बलवती होती जा रही है। पास के किसी शहर, कस्बे में आपकी नौकरी लग जाए तो चलकर वहीं अपना बसेरा बना लेंगे। कब तक इस बूढ़े की सेवा में दम घुटाते रहेंगे? बाहर चलने में ही सुख है। यहाँ की दमघोंटू जिंदगी से तो बाहर रहकर जीवन यापन करना ही श्रेयस्कर होगा।"
पति अखिलेश यह सब कुछ सुनकर भी मौन था। क्या सोचा था और क्या हो गया। सब कुछ मेरे लिए जैसे धुंधला सा हो गया था। इस घर का माहौल, मेरी मेहनत और आस्था, इन सबकी कीमत क्या अब सिर्फ इग्नोरेंस और उपेक्षा में तब्दील हो रही थी? क्या मैं और मेरी पत्नी के वर्षों की मेहनत अब भी इतने जल्द मिट जाएगी?
उनकी बातें सुनकर मेरे मन में तरह-तरह के ख्याल आने लगे। मुझे याद आया कि पहले, जब अखिलेश छोटा था, तो वह मुझे अपनी छोटी-छोटी बातें बड़े हर्ष के साथ सुनाता था। कभी घर में किसी नई चीज़ के बारे में बताता, कभी मुझे नए गाने के बारे में बताता। अब सब कुछ बदल चुका था। वह अपना जीवन, अपनी दुनिया खुद बनाने की सोचने लगा था। लेकिन क्या मैं, एक पिता के रूप में, यही चाहता था? क्या मुझे लगता था कि उसका घर-परिवार बस ऐसे ही चल सकता है?
सुरेखा की बातें मुझे चुपके से आहत कर गई थीं। क्या मुझे अपनी जिंदगी की बाकी उम्र इस तरह अकेले बितानी थी? क्या मेरी सेवा की कोई कद्र नहीं रही?
अगले दिन, मैंने तय किया कि मैं इस चुप्पी को तोड़ूँगा। घर में खामोशी का घना माहौल पसरा हुआ था। मैंने अखिलेश से बात करने का मन बनाया। मैंने खुद को शांत रखा और कहा, "बेटा, सुरेखा की बातें सुनने के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ कि तुम्हारे दिल में अब मेरी कोई अहमियत नहीं रही। क्या तुम सचमुच मेरे बारे में ऐसे सोचते हो?"
अखिलेश ने मेरी बात को ध्यान से सुना, लेकिन फिर भी चुप ही रहा। उसका मुँह खुला, लेकिन कोई शब्द बाहर नहीं आए। उसकी चुप्पी ने ही मुझे ज्यादा परेशान कर दिया। मैं जानता था कि घर का माहौल धीरे-धीरे बदल रहा है, लेकिन यह बदलाव इतना तेज और कड़वा होगा, इसका मुझे अंदाजा नहीं था।
सुरेखा ने फिर अगले दिन मुझसे सीधे कहा, "आपका कोई फायदा नहीं है यहां बैठने का। हम दोनों अपना रास्ता अलग-अलग चुन सकते हैं। आपको क्या लगता है, हम इस बंधन को निभाने के लिए अपनी जिंदगी नष्ट कर देंगे?" उसकी इन बातों में एक ठंडी सी लहर थी, जो मेरे भीतर गहरी चोट की तरह समाई।
मेरे भीतर कई सालों से दबी हुई यादें ताजा हो गईं। जब मैंने अपने बेटे को सिखाया था, प्यार और परिवार की अहमियत क्या होती है। क्या वह उस मार्ग से हट चुका था, जिसे हमने उसे दिखाया था? क्या वह अब परिवार के बंधन से परे अपने निजी सुख की तलाश कर रहा था?
कुछ दिन बाद, मैंने अखिलेश से खुलकर बात की, "बेटा, मैं तुमसे यही चाहता हूँ कि तुम अपने जीवन को ठीक से समझो और कोई ऐसा कदम ना उठाओ, जिससे तुम्हें बाद में पछताना पड़े। परिवार का साथ और समर्थन ही सबसे महत्वपूर्ण है।"
अखिलेश के चेहरे पर एक हल्की सी झलक दिखाई दी, जैसे वह मेरी बातों को समझने की कोशिश कर रहा था। लेकिन फिर भी उसके भीतर कहीं न कहीं वह दूरी कायम थी, जो पहले कभी नहीं थी।
कहानी से शिक्षा:
इस कहानी से यह संदेश मिलता है कि हर रिश्ते में संघर्ष आते हैं, लेकिन हमें कभी भी अपने परिवार के मूल्यों और रिश्तों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक परिवार का रिश्ता सिर्फ दिखावा नहीं होता, बल्कि यह सामूहिक प्यार, समझ और आदान-प्रदान का प्रतीक होता है। हमें चाहिए कि हम अपने परिवार के साथ अपने संबंधों को न केवल बनाए रखें, बल्कि उन्हें हर वक्त मजबूत और स्वस्थ बनाए रखने की कोशिश करें।
जब हम खुद को अकेला और उपेक्षित महसूस करने लगते हैं, तो हमें अपने परिवार के साथ बैठकर समस्याओं को समझने और हल करने की कोशिश करनी चाहिए। यह रास्ता किसी भी बुरे हालात से बाहर निकलने का सबसे अच्छा तरीका है।

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