"झांसी की रानी की यादें"
लेखक: लकी ठाकुर
शाम का समय था और सुमेधा अपनी कार में सवार होकर कलैक्ट्रेट के पास की व्यस्त सड़क पर जा रही थी। सड़क पर वाहनों का भारी ट्रैफिक था, और सुमेधा की गाड़ी भी हिचकोले खाते हुए धीमी गति से चल रही थी। तभी अचानक एक बाइकचालक, जो तेज़ी से उसकी बगल से निकला, उसकी गाड़ी के पास से गुजरते हुए उसकी नाक में परफ्यूम की महक छोड़ता गया।
"उफ, गाड़ी चलाने की जरा भी तमीज नहीं है लोगों में," सुमेधा गुस्से में बोली, और गाड़ी को थोड़ी सी डगमगाने के बावजूद बैलेंस बनाए रखा। अगर वह बाइक वाला इतने फुर्ती से न निकलता तो शायद एक बड़ी दुर्घटना हो जाती।
वो रास्ता, जहाँ सुमेधा जा रही थी, बहुत भीड़-भाड़ वाला था। शाम के समय जब सूरज ढलने लगता है, लोग खरीदारी के लिए निकल पड़ते हैं और ऑफिस भी इसी समय बंद होते हैं। सुमेधा को फिर से वही बाइक वाला अपनी बाईं ओर दिखाई दिया। बाइक को रोकते हुए उसने सुमेधा से कहा, "सॉरी, मैम।"
"ठीक है, कोई बात नहीं," सुमेधा हल्की खीज के साथ बोली, फिर बुदबुदाई, "अब ये क्या तुक है, बीच रास्ते रुककर सॉरी बोले जा रहा है।"
"सॉरी तो बोल दिया न आंटी," सुमेधा ने आवाज की ओर देखा और बाइक की टंकी पर बैठी एक छोटी सी बच्ची को देखा, जो भोलेपन से सुमेधा की तरफ देख रही थी।
"पापा, आंटी अभी भी गुस्से में हैं। आंटी ने क्या बांधा है?" बच्ची बोली, जो सुमेधा के नकाब जैसे दुपट्टे को देख रही थी।
सुमेधा ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "बिलकुल नहीं, बेटा, मैं गुस्से में नहीं हूं। अब जाओ।" फिर वह फुर्ती से आगे बढ़ गई।
घर पहुंचते ही सुमेधा पर अजीब सी खुमारी छा गई। उसकी यादों में अतीत के रंगीन दिन तैरने लगे। आज, कई सालों बाद, स्कूल के दिन याद आए। कैसे वह और उसकी सखियाँ मिलकर तरह-तरह की अठखेलियाँ किया करती थीं। न जाने क्या था उस वक्त, नया विषय शुरू होने का उत्साह या फिर उम्र का वो मोड़, जब सब कुछ एकदम साफ और रंगीन नजर आने लगता था।
डॉक्टर बनने का सपना उसने अपनी आँखों में हमेशा रखा था। इसी सपने को पूरा करने के लिए वह पढ़ाई में पूरी तरह से जुटी रहती थी। उसकी शिक्षिकाएँ भी उस पर बेहद खुश रहती थीं। सुमेधा न केवल विज्ञान में, बल्कि साहित्य में भी बेहद रुचि रखती थी। खासकर हिंदी में उसका प्रदर्शन गजब का था।
चित्रकला में रुचि होने के कारण उसकी फाइलें अक्सर सहपाठियों के लिए उदाहरण बन जाती थीं। जब भी किसी शिक्षिका को विद्यार्थियों को अच्छी फाइलें बनाने का तरीका समझाना होता, वे सुमेधा की फाइलें मंगवातीं।
माँ ने हमेशा कहा था, "कोएड स्कूल में मत पढ़ाओ इसे, लड़कियाँ बिगड़ जाती हैं।" "तुम चिंता मत करो। देखना, हमारी बेटी ऐसा कोई काम नहीं करेगी। वह हमारा नाम रौशन करेगी," पिताजी ने इस पर अपना पक्ष रखा था।
सुमेधा ने उस वक्त अपने पिताजी के शब्दों को बहुत अच्छे से समझा और स्कूल में वह हमेशा लड़कियों के ग्रुप में ही रहती थी। लड़कों से थोड़ी बहुत बातचीत होती थी, लेकिन वह अक्सर उनसे कटी-कटी रहती थी। कई लड़के उसे घमंडी समझते थे, और उसके सख्त व्यवहार से डरकर वे बातचीत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे।
एक दिन, सुमेधा के सहपाठी रमेश ने उसके लिए प्रेमपत्र लिखा और अपनी नोटबुक में रख दिया। किसी तरह वह पत्र नंदिनी के हाथ में पड़ गया, और फिर पूरी क्लास में लड़कियाँ सुमेधा को छेड़ने लगीं।
"लाली, तुम बनती तो बड़ी भोली हो, लेकिन एक दिन यह गुल खिलाओगी, हमें पता नहीं था," नंदिनी गंभीर स्वर में बोली, और फिर सभी लड़कियाँ हंसी से गूंज पड़ीं।
सुमेधा को यह सब बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। वह तुरंत रमेश का प्रेमपत्र प्रिंसिपल के पास ले गई, और उसके बाद रमेश को ऐसी सजा दी गई कि भविष्य में किसी भी लड़के ने सुमेधा के सामने कोई प्रस्ताव रखने की हिम्मत नहीं की।
लड़कों के ग्रुप में अक्सर कहा जाता, "झांसी की रानी के आगे न जाना, नहीं तो अपनी जान से हाथ धोने पड़ सकते हैं।" सुमेधा ने अपनी कड़ी छवि बनाई थी, जो उसे स्कूल में एक अलग पहचान देती थी।
कभी-कभी याद करते हुए सुमेधा सोचती, "क्या वह वही लड़की है जिसने अपनी ज़िंदगी में इतने सारे सपने और विश्वास जिए थे?" आज भी, सुमेधा उसी जुनून और संकल्प के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही है, जो कभी उसे स्कूल में मिला था।
मोरल:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि हमारी पहचान और हमारी ज़िंदगी के फैसले अक्सर हमारे बचपन और किशोरावस्था के अनुभवों से ही बनते हैं। हर कोई अपनी राह पर चलता है, लेकिन अपने आदर्शों और उद्देश्य के प्रति ईमानदारी बनाए रखना बेहद जरूरी है।

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