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अनदेखा रास्ता – भाग 3

 अनदेखा रास्ता – भाग 3

लिखित: लकी ठाकुर




रात पहले से कहीं ज्यादा भारी थी, ये रात बादलों से नहीं, बल्कि उसके दिल में छाए तनाव से भारी थी। राजन खिड़की के पास बैठा था, नीचे की शांति से भरी सड़कों को देख रहा था। सड़क पर लगे स्ट्रीटलाइट्स की हल्की रोशनी धीरे-धीरे सब कुछ और थोड़ा ज़्यादा उम्मीद भरा बना रही थी।

कई हफ्तों से वह नेहा को नहीं देख पाया था, और फिर भी उसकी अनुपस्थिति उसी दिन की तरह ताज़ा महसूस हो रही थी। उसके कमरे के हर कोने में उनकी यादें गूंज रही थीं – छोटी-छोटी बातें, वो खामोश पल, हंसी जो कभी हर जगह बिखरी रहती थी। लेकिन अब, सब कुछ खाली था, जैसे कोई हवा का झोंका उसे निगल गया हो और उसे सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था।

"मैंने उसे जाने क्यों दिया?" राजन ने खुद से धीरे से पूछा, उसकी आवाज़ रात की खामोशी में खो गई।

उसने अपनी उंगली से पुराने फोटो का किनारा छुआ, जिसमें वह और नेहा पहाड़ियों पर साथ खड़े थे, मुस्कुराते हुए जैसे उनके पास वक्त की कोई कमी न हो। कितने भोले थे वे दोनों तब। कितने यकीन से सोचते थे कि यह हमेशा के लिए रहेगा। लेकिन हमेशा, ऐसा लगता है, कभी और किसी और रास्ते पर था।

फोन की घंटी बजी और कुछ देर के लिए, उसने सोचा कि शायद यह नेहा हो। उसने झपट कर फोन उठाया, उसका दिल धड़कते हुए छाती में समाया था, लेकिन देखा तो उस पर एक नाम था जिसे उसने कभी अपेक्षित नहीं किया था।

अंजलि

उसका मन एक पल के लिए भटक गया। अंजलि, वह नाम जो कुछ सुकून और कुछ उलझन दोनों लेकर आता था। वह उसकी बचपन की दोस्त थी, वह इंसान जो उसे बिना कहे समझती थी। सालों से उनका संपर्क कम हो गया था, लेकिन आज, एक संदेश ने उसे खींच लिया था। शायद यह वह संकेत हो, जिसे उसे आगे बढ़ने के लिए चाहिए था।

उसने कॉल उठा लिया।

"राजन? तुम वहां हो?"

अंजलि की आवाज़ जैसे ठंडी हवा की एक लहर की तरह, सुकून देने वाली और दिल में हलचल मचाने वाली थी।

"हां, मैं यहां हूं अंजलि। क्या हुआ?" राजन ने जवाब दिया, कोशिश की कि उसकी आवाज़ ठहरी रहे, लेकिन फिर भी वह खामोशी महसूस कर रहा था, जैसे उसके दिल की गहराई में कुछ टूटने वाला हो।

दूसरी ओर से कुछ पल की चुप्पी थी, फिर अंजलि ने धीरे से कहा, "मुझे नेहा के बारे में सुना... और बस सोचा कि तुम ठीक हो, क्या हाल है तुम्हारा?"

यह सवाल बहुत साधारण सा था, लेकिन राजन के दिल में यह कुछ और ही गूंज रहा था। नेहा। जब भी उसका नाम आता, जैसे दिल में कोई भारी पत्थर गिर जाता।

"मैं... बस वैसे ही कोशिश कर रहा हूं, समझो," राजन ने कहा, उसकी आवाज़ में हल्की सी टूटन थी, जो शायद उसने कभी महसूस नहीं की थी।

अंजलि ने महसूस किया कि उसकी आवाज़ में कुछ गहरे दर्द की परतें थीं। "देखो, मुझे पता है, यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन क्या तुम मुझसे मिलना चाहोगे? हम कॉफी पी सकते हैं या बस बातें कर सकते हैं। हम दोनों का समय बीत चुका है, लेकिन लगता है तुम्हें किसी से बात करने की जरूरत है।"

राजन थोड़ी देर के लिए चुप रहा, उसकी सोच में उथल-पुथल थी। उसने अंजलि से सालों तक बात नहीं की थी, और अब वह उसे यह उम्मीद दे रही थी, शायद इस पल में, वह सही था, उसे किसी से बात करनी चाहिए थी।

"हां," उसने कहा, उसकी आवाज़ अब हल्की और शांत थी, "शायद यह अच्छा रहेगा। मैं चाहता हूं कि हम मिलें।"


अंजलि उससे उसी कैफे में मिली, जो उनके बचपन का पसंदीदा था। वह जगह अब थोड़ी बदल चुकी थी, लेकिन फिर भी एक अजनबी सी familiar feeling थी। जब वह अंदर गया, तो उसका मन उस पुरानी दुनिया में लौट गया। दीवारें, कॉफी की महक, कपों की आवाज़ - सब कुछ जैसे एक ऐसे समय से जुड़ा था जिसे वह अब दोबारा महसूस नहीं कर पा रहा था।

वह अंजलि को पहली ही नजर में पहचान गया। वह खिड़की के पास बैठी थी, उसके बाल पहले से लंबे हो गए थे, लेकिन उसकी मुस्कान वही थी, वही गर्मजोशी, वही सुरक्षा। वह अपनी हर भावना को महसूस कर पा रहा था, जैसे कुछ देर के लिए उसका दिल हल्का हो गया था।

अंजलि ने उसे देखा और मुस्कुराते हुए खड़ी हो गई, “हाय, तुम आ गए।”

राजन ने उसकी ओर बढ़ते हुए उसे गले लगाया। उनका गले लगना कुछ ऐसा था जैसे वह दोनों पुरानी यादों में खो गए हों। उसने खुद को उसी पल में खो दिया, जैसे सब कुछ वहीं थम गया हो।

“हाय,” राजन ने कहा, अपनी मुस्कान को छिपाते हुए और फिर सामने बैठकर बोला, “अच्छा लगा तुम्हें देख कर।"

अंजलि ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "देखो, बात करने से कहीं बेहतर है, राजन। क्या तुम ठीक हो?"

राजन ने सिर झुकाते हुए कहा, “मैं ठीक नहीं हूं अंजलि। मैं... मुझे नहीं पता, शायद मैंने अपनी जिंदगी में सबकुछ खो दिया है।”

अंजलि ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा। “राजन, कभी-कभी यह ठीक है कि हम खुद को नहीं समझ पाते। हम गलतियां करते हैं, हम किसी को खो देते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम खत्म हो गए।"

राजन की आँखें नम हो गईं। वह सोच रहा था, क्या अब मैं कभी ठीक हो पाऊंगा? क्या मेरी ज़िंदगी फिर से पटरी पर आएगी?

वह धीरे से बोला, “क्या तुमने कभी सोचा कि हम कभी भी अपनी गलतियों से उबर पाएंगे?”

अंजलि ने उसकी आँखों में देखा, और फिर कहा, "हां, हमें समय चाहिए। और कभी-कभी, हमें अपनी गलतियों को स्वीकार कर, उन्हें अपनी ताकत बनाना पड़ता है।"

राजन के भीतर एक हलचल सी मचने लगी। उसे महसूस हो रहा था कि शायद, सिर्फ शायद, अंजलि सही कह रही है। वह भले ही पूरी तरह से अपनी गलतियों को नहीं सुधार सकता, लेकिन क्या वह उनसे सीख सकता था?


रात के अंत तक, राजन को एहसास हुआ कि शायद यह एक नई शुरुआत हो सकती है। वह जानता था कि नेहा की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती, लेकिन शायद अब वह खुद को नए तरीके से समझ सकता था। शायद, अब वह आगे बढ़ सकता था।

अंजलि से मिलने के बाद, वह महसूस करता था कि वो अकेला नहीं है, और यह सच था, उसके पास अब भी लोग थे जो उसकी परवाह करते थे।

"शुक्रिया, अंजलि। तुमसे मिलकर अच्छा लगा।" उसने कहा, जैसे कोई हल्की सी राहत मिली हो।

"हमेशा, राजन। तुम्हारे लिए हमेशा यहां हूं मैं," अंजलि ने मुस्कुराते हुए कहा।

वह घर की ओर चल पड़ा, और उसकी चाल में कुछ हलचल थी। कुछ बदल चुका था। शायद वह सबकुछ ठीक नहीं कर सकता था, लेकिन अब उसके पास एक रास्ता था, एक आशा थी।


कहानी जारी रहेगी...

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